व्यवसाय संगठनों के स्वरूप

Forms of Business Organisations

व्यावसायिक संगठनों के अनेक स्वरूप हैं, जिन पर आप अपनी कंपनी के लिए विचार कर सकते हैं। इन विभिन्न स्वरूपों की जानकारी देने से पहले हम नीचे कुछ कारकों का उल्लेख कर रहे हैं, जिन पर आपको व्यावसायिक संगठन का स्वरूप चुनते समय विचार करना चाहिए:

  • व्यवसाय की प्रकृति :- आपके व्यवसाय का संगठन आपके व्यवसाय की प्रकृति पर निर्भर होगा।
  • परिचालनों की मात्रा :- व्यवसाय की मात्रा तथा बाजार क्षेत्र का आकार प्रमुख पहलू हैं। बड़े बाजार परिचालनों के लिए सार्वजनिक या निजी कंपनियाँ बेहतर रहती हैं। छोटे परिचालनों के लिए साझेदारी या प्रोप्राइटरशिप का गठन किया जाता है।
  • नियंत्रण की मात्रा : - यदि आप सीधा नियंत्रण रखना चाहें, तो प्रोप्राइटरशिप अच्छा विकल्प है। व्यवसाय के लिए कंपनी बनाने से स्वामित्व और प्रबंधन का पृथक्करण हो जाता है।
  • पूँजी की राशि :- जब संसाधनों की जरूरत बढ़ती है तो स्वरूप में परिवर्तन करना पड़ता है, जैसे साझेदारी फर्म को कंपनी बनाना पड़ता है। 
  • जोखिमों और देयताओं की मात्रा :- यह देखना होगा कि मालिक किस सीमा तक जोखिम उठाने को तैयार हैं। पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी में ऊँचा जोखिम रहता है, जबकि सार्वजनिक या निजी कंपनी में मालिकों के लिए जोखिम कम होता है, क्योंकि विधिक संस्था और उसके मालिक अलग-अलग होते हैं।
  • तुलनात्मक कर देयता - आपकी कंपनी की कर देयता आपके चुने हुए संगठन के स्वरूप के अऩुसार होगी।

  व्यावसायिक संगठनों के विभिन्न रूपों की चर्चा आगे के खंडों में की गई है।

 

पूर्ण स्वामित्व वाले प्रतिष्ठान

 

यह कारोबार का सबसे पुराना तथा सबसे सामान्य स्वरूप है। इस स्वरूप की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :

  • गठन में आसानी (कोई विस्तृत विधिक औपचारिकताएं नहीं)

  • पूँजी स्वयं मालिक द्वारा प्रदान की जाती है।

  • पूर्ण नियंत्रण

  • स्वामित्व का कोई पृथक्करण नहीं

  • असीमित देयता

  • निरंतरता का अभाव - यदि मालिक मर जाए तो कारोबार समाप्त

  • पूंजी जुटाने में कठिनाई

लाभ

हानि

गठन में आसानी

सीमित पूंजी

मालिक को अच्छा कार्य करने के लिए प्रोत्साहन

सीमित प्रबंधकीय क्षमता

शीघ्र निर्णय तथा लोचशीलता

सीमित जीवन

व्यवसाय की गोपनीयता

असीमित देयता


निम्नलिखित के लिए उपयुक्त :

  • मध्यम जोखिम वाले व्यवसायों के लिए

छोटे वित्तीय संसाधन तथा छोटी पूँजी आवश्यकताएं

 

Resources: 

 

 

साझेदारी प्रतिष्ठान

साझेदारी प्रतिष्ठान

जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी ऐसे व्यवसाय के लाभ का साझा करने के लिए सहमत होते हैं, जो उन सभी के द्वारा अथवा उन सभी की ओर से उनमें से किसी एक के द्वारा चलाया जाए, तो उन व्यक्तियों के बीच के संबंध को साझेदारी कहा जाता है। इस स्वरूप की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :

  • गठन में आसानी (कोई विस्तृत कानूनी गतिविधियाँ नहीं)
     

  • न्यूनतम साझेदार -2, अधिकतम साझेदार - 10 बैंकिंग में), 20 ( अन्य सभी व्यवसायों में)


 

  • विधिक अस्तित्व का कोई पृथक्करण नहीं.
     

  • प्रत्येक साझेदार के लिए संपत्ति का स्वामित्व परस्पर एक दूसरे के लिए प्रबंध का अधिकार देता है।

 

  • साझेदारों की देयता असीमित 

  • हितों के अंतरण पर प्रतिबंध

  • सीमित जीवन काल (यदि एक भी साझेदारी इसे कायम रखने में समर्थ नहीं है तो इसे समाप्त किया जाना चाहिए)

  • पूंजी के लिए बड़ी राशि जुटाने में कठिनाई

  • भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 द्वारा शासित

 

लाभ

हानि

गठन में आसानी

अंतिम प्राधिकारी की अनुपस्थिति

अपेक्षाकृत अधिक पूँजी तथा ऋण संसाधन

अन्य साझेदारों के कार्यों के लिए देयता

बेहतर निर्णय तथा अधिक प्रबंधकीय गतिविधि

सीमित जीवन

 

असीमित देयता


उपयुक्तता : मझोले आकार के कारोबार जिनमें सीमित पूंजी की जरूरत हो।

सीमित देयता साझेदारी (एलएलपी)

सीमित देयता साझेदारी (एलएलपी)


 

सीमित देयता साझेदारी (एलएलपी) को एक वैकल्पिक निगमित व्यवसाय साधन के रूप में देखा जाता है, जो सीमित देयता के लाभ देती हैं किंतु इसके सदस्यों को यह लचीलापन उपलब्ध होता है कि वे अपनी आंतरिक संरचना को परस्पर सहमत करार पर आधारित साझेदारी के रूप में गठित कर सकें। एलएलपी स्वरूप के परिणामस्वरूप किसी भी प्रकार की सेवाएँ प्रदान करने वाले अथवा वैज्ञानिक और तकनीकी विषयों से संबंधित काम करने वाले उद्यमी, प्रोफेशनल तथा उद्यम अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप वाणिज्यिक रूप से कार्यकुशल साधन गठित कर सकते हैं। इसके ढाँचे और परिचालन में लचीलेपन के फलस्वरूप, एलएलपी लघु उद्यमों के लिए तथा उद्यम पूंजी द्वारा निवेश के लिए भी उपयुक्त होगा।

यह सीमित देयता साझेदारी अधिनियम, 2008 के प्रावधानों से शासित होता है।

प्रमुख विशेषताएं :


 

  • पृथक विधिक अस्तित्व

  • सतत विद्यमानता - साझेदार की मृत्यु (अथवा जारी रख पाने में उसकी असमर्थता) के बावजूद भी इसका अस्तित्व बना रहता है। 

  • साझेदारी करार तैयार करने में लचीलापन रहता है। नामित साझेदारों के कर्तव्य और दायित्व सीमित देयता साझेदारी अधिनियम, 2008 के अनुसार होंगे।

  •   साझेदार दूसरे साझेदारों के कार्यों के लिए जवाबदेह नहीं। देयता एलएलपी में उनके अंशदान तक सीमित।

  • शेयर अंतरण प्रतिबंधित

  •   एलएलपी के गठन के लिए न्यूनतम 2 साझेदार चाहिए। अधिकतम 50।

  • वार्षिक लेखा रख-रखाव की बाध्यता 

  • केंद्र सरकार को जाँच का अधिकार 

  • कोई फर्म, प्राइवेट कंपनी या कोई गैर-सूचीबद्ध सार्वजनिक कंपनी खुद को एलएलपी में रूपांतरित कर सकती है। 

  • कंपनी अधिनियम, 1956 के प्रावधान भी शामिल किए जा सकते हैं। 

  • भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 लागू नहीं होगा।

 

Resources: 

Please see further details and  FAQs on LLPs here

How to Incorporate a New LLP?

Link for various Forms required for LLP purposes

सीमित दायित्‍व भागीदारी (एलएलपी) – विधिक पहलू

Resources: 

एलएलपी का एक मुख्‍य पहलू है कि इसके लिए लाभ का उद्देश्‍य होना आवश्‍यक है । इस प्रकार यह दानार्थ संगठनों हेतु उपलब्‍ध नहीं है । 

एलएलपी की मूलभूत विशेषताएं

संयुक्‍त संरचना

भागीदारी एवं कंपनी का समन्‍वय है । असीमित दायित्‍व की कमियों एवं कंपनी कानून के प्रावधानों की कठोरता को दूर करता है ।  

सीमित दायित्‍व, शाश्‍वत संरचना

स्‍वामित्‍व को पृथक करना सुनिश्चित करता है, इससे दायित्‍व फर्म तक सीमित रहता है और भागीदारों पर लागू नहीं होता ।  

परिचालनों में लचीलापन

आंतरिक प्रबंधन, भागीदारों को पारिश्रमिक, प्रबंध शक्ति व कुछ भागीदारों को वीटो शक्ति जैसी विशिष्‍ट शक्तियों के संबंध में अधिकतम लचीलापन है । ये अपने नाम पर संपत्ति भी रख सकती है ।

 एलएलपी में भागीदार

  1. एक भागीदार अन्‍य भागीदारों के लिए बाध्‍यकारी नहीं हो सकता । 
  2. कौन भागीदार हो सकता है ? एक कंपनी, एलएलपी, विदेशी एलएलपी एवं विदेशी कंपनी एलएलपी के भागीदार हो सकते हैं [तथापि, फेमा प्रावधानों में कोई संशोधन होने तक, लाभों या पूंजी के प्रत्‍यावर्तन में समस्‍याएं होंगी].
  3. न्‍यूनतम दो भागीदार होने चाहिए, कोई अधिकतम संख्‍या नहीं है । 
  4. भागीदारियों पर कोई प्रतिबंध नहीं – एक व्‍यक्ति कितनी भी एलएलपी में भागीदार बन सकता है ।
  5. पदनामित भागीदार – न्‍यूनतम दो भागीदारों को ‘पदनामित भागीदार’ के रूप में नामित किए जाने चाहिए, जो एलएलपी अधिनियम के अंतर्गत सांविधिक दायित्‍वों को पूर्ण कर सकें । अन्‍य भागीदारों को, सिवाय धोखाधड़ी के मामले के, सामान्‍यत: उत्‍तरदाई नहीं ठहराया जाएगा।
  6. एलएलपी करार
  1. करार की आवश्‍यकता  – एलएलपी अधिनियम, 2008 में काफी परिचालनगत लचीलापन है । तकनीकी रूप से, एलएलपी करार अनिवार्य नहीं है । कोई एलएलपी करार न होने की स्थिति में, एलएलपी की प्र‍थम अनुसूची में दिए गए प्रावधान स्‍वत: लागू होंगे । व्‍यवहार्यत:, प्रथम अनुसूची के प्रावधान अधिकतम स्थितियों में स्‍वीकार्य नहीं होते हैं । अत: प्रत्‍येक एलएलपी में एलएलपी करार होना अपेक्षित हो जाता है । एलएलपी का एक मानक प्रारूप होना न तो संभव है और न ही ऐसी सलाह दी जाती है । प्रस्‍तावित एलएलपी की जरूरतों व संरचना को ध्‍यान में रखते हुए एलएलपी करार का प्रारूप तैयार किया जाना चाहिए ।
  2. करार का निष्‍पादन – करार का निष्‍पादन एलएलपी के निगमन के पहले अथवा बाद में किया जा सकता है । चूंकि यह भागीदारों के बीच एक करार है, अत: इसके निष्‍पादन के संबंध में कुछ लचीलापन है । यह करार कितनी भी बार संशोधित भी किया जा सकता है ।  
     
  3. स्‍टांप ड्यूटी का ई भुगतान – कंपनी अधिनियम के अंतर्गत स्‍टांप ड्यूटी के ईभुगतान के प्रावधान किए गए हैं । जब तक एलएलपी अधिनियम के अंतर्गत इसके समानांतर प्रावधान नहीं बनाए जाते, तब तक भौतिक स्‍टांप एवं दस्‍तावेजों का भौतिक प्रस्‍तुतीकरण जारी रहेगा । 

एलएलपी करार पर सामान्‍य टिप्‍पणियां

  • करार को सावधानीपूर्वक तैयार करना – ऐसा कोई मानक एलएलपी करार नहीं हो सकता है, जो सभी प्रकार की एलएलपी की जरूरतों हेतु उपयुक्‍त हो । अत: ये अद्वितीय होता है । उदाहरण के लिए, कुछ एलएलपी परिवार भागीदारियों के रूप में तो कुछ संयुक्‍त उद्यमों के रूप में हो सकते हैं । 
  • करार को यथासंभव लचीला होना चाहिए । यह करार जितना कठोर होगा, उतना ही अधिक परिचालनगत समस्‍याएं होंगी । सभी पक्षों की जरूरतों को ध्‍यान में रखा जाना चाहिए । 
  • भागीदारों के प्रकार – भारतीय भागीदारी अधिनियम के अनुसार, भागीदार किसी फर्म में परस्‍पर एजेंट होते हैं । तथापि, एलएलपी अधिनियम के अंतर्गत, भागीदारों का प्राधिकार एलएलपी करार के माध्‍यम से सीमित किया जा सकता है । 
  • वीटो शक्ति – करार में एक या अधिक भागीदारों को वीटो शक्ति के प्रावधान होने चाहिए । यदि आप एलएलपी के एक भागीदार के रूप में निर्णय प्रक्रिया को नियंत्रित करना चाहते हों, तो यह उपयोगी होगा ।   
  • कार्यपालक /प्रबंध समिति – भागीदारों की बड़ी संख्‍या के मामले में, बेहतर होगा कि प्रबंधन के संचालन हेतु वरिष्‍ठ भागीदारों की एक समिति बनाई जाए । 
  • भागीदारों की संख्‍या – एलएलपी करार निष्‍पादित करने हेतु न्‍यूनतम कानूनी आवश्‍यकता 2 भागीदारों की है । तथापि, यदि भागीदारों की संख्‍या अधिक हो, तो बेहतर होगा कि कंपनी का निगमन 2 भागीदारों के साथ किया जाए तथा बाद में अन्‍य भागीदारों को शामिल किया जाए ।     
  • फार्म 3 के अनुरूप एलएलपी करार बनाना – फार्म 3 के स्‍तंभ 7 से 20 तक, एलएलपी करार संबंधी सूचना के बारे में होते हैं । बेहतर होगा कि यदि एलएलपी करार को यथासंभव इसी अनुसार बनाया जाए, जिससे फार्म 3 प्रस्‍तुत करने और कंपनी रजिस्‍ट्रार द्वारा इसकी जांच करने में सुविधा होगी । 

एलएलपी को आरंभ करने हेतु कदम 

  1. एक डी पिन (पदनामित भागीदार पहचान संख्‍या)प्राप्‍त करें. इसके आवेदन हेतु फार्म 7 का उपयोग करें और बाद में फार्म की भौतिक प्रति भेजें ।    
  2. डिजिटल हस्‍ताक्षर – पदनामित भागीदारों को किसी प्रमाणन एजेंसी (सीए) से, श्रेणी II या इससे ऊपर का एक डिजिटल हस्‍ताक्षर प्रमाणपत्र (डीएससी) प्राप्‍त करना चाहिए ।
  3. एलएलपी वेबसाइट पर डी पिन एवं डीएससी को रजिस्‍टर करें ।   
  4. भागीदारों के बारे में सूचना प्रस्‍तुत करना  - फार्म 3 (एलएलपी करार की सूचना) एवं फार्म 4 (भागीदार/पदनामित भागीदार की नियुक्ति की सूचना). ये फार्म फार्म 2 के साथ ही अथवा निगमन के 30 दिनों के भीतर जमा किए जा सकते हैं ।   
  5. एलएलपी करार की विधिवत स्‍टांपयुक्‍त एक मूल प्रति भेजें ।  

एलएलपी को चलाना 

  • गठन – एलएलपी के निगमन की प्रक्रियाएं, कंपनी के निगमन के समान हैं । निगमन दस्‍तावेज (ज्ञापन के समान) और एलएलपी करार (संस्‍था के अंतर्नियमों के समान) इलेक्‍ट्रानिक रूप से फाइल किया जाना अपेक्षित होता है ।   
  • औपचारिकताएं - एलएलपी  चलाने हेतु अत्‍यंत कम औपचारिकताएं हैं । उदाहरण हैं – बोर्ड बैठकों, सामान्‍य बैठकों, प्रभारों के पंजीकरण, प्रबंधस्‍तरीय पारिश्रमिक की सीमाएं, शेयरों के जारी करने व अंतरण, निदेशकों के चयन, बोर्ड की शक्तियों पर प्रतिबंध आदि जैसी कोई औपचारिकताएं नहीं हैं ।   
  • लेखे और रिटर्नों की ई फाइलिंग – लेखों का संधारण आवश्‍यक है, किंतु एलएलपी  लेखापरीक्षण प्रावधानों से मुक्‍त है । इलेक्‍ट्रानिक रूप से रिटर्न फाइल करते समय लेखा व शोधन क्षमता की विवरणी अपेक्षित है । यह अर्हता के अधीन है, जो पण्‍यावर्त एवं योगदान पर आधारित है ।   
  • भागीदारों/ होल्डिंग आउट में परिवर्तन -  कानूनन भागीदारों में बदलाव के 30दिनों के भीतर अधिसूचना आवश्‍यक है ।  ‘होल्डिंग आउट’ का प्रावधान भी रखा गया है (यदि कोई गैर भागीदार ऐसा संकेत देता है कि वह फर्म में किसी बाहरी के लिए भागीदार है, तो ऐसा गैर भागीदार भी भागीदार के समा‍न ही उत्‍तरदायी ठहराया जाएगा ।     
  • पुनर्गठन/समामेलन – पुनर्गठन, समामेलन व समझौतों, समापन, निरीक्षण एवं जांच के प्रावधान कंपनी अधिनियम के समान ही हैं ।      
  • मौजूदा कंपनी/फर्मों का रूपांतरण- मौजूदा कंपनियां, निजी व गैरसूचीकृत कंपनियां, एलएलपी में रूपांतरित हो सकती है, बशर्ते :
    • यदि आयकर अधिनियम की धारा 47(xiib) में दी गई शर्तें पूर्ण होती हों, तो ऐसे रुपांतरण से कंपनी या इसके शेयरधारकों को कोई पूंजीगत लाभ नहीं होंगे । 
    • केवल ऐसी छोटी कंपनियां रूपांतरित हो सकती हैं, जिनका पण्‍यावर्त 60 लाख से कम हो ।   
  • एलएलपी का कराधान -  एलएलपी का कराधान, एक भागीदारी के समान ही होगा । अपवाद यह है कि किसी भागीदारी फर्म का भागीदार फर्म के आयकर दायित्‍वों हेतु वैयक्तिक तौर से उत्‍तरदाई होगी। एलएलपी के मामले में, सभी भागीदार संयुक्‍त रूप से और अलग अलग आयकर दायित्‍वों हेतु उत्‍तरददायी हैं, किंतु कोई भागीदार इस उत्‍तरदायित्‍व से बच सकता है यदि वह ऐसा साबित कर सके कि गैर वसूली, उसकी ओर से किसी गंभीर लापरवाही या कर्त्‍तव्‍य की अवहेलना के कारण नहीं हुई है ।

एलएलपी हेतु अपेक्षित विवरणियां एवं अभिलेख  

  • खातों की बहियां 
  • कार्यवृत्‍त पुस्तिका –भागीदारों के साथ एवं भागीदारों की प्रबंध/कार्यपालक समिति के साथ हुई बैठकों के कार्यवृत्‍त दर्ज करने हेतु । 
  • भागीदारों में परिवर्तन – भागीदार/पदनामित भागीदार में हुए किसी भी परिवर्तन को ऐसे बदलाव के
  • 30 दिनों के भीतर ईफार्म 3 का उपयोग  करते हुए इलेक्‍ट्रानिक रूप से फाइल किया जाना चाहिए । 
  • पूरक एलएलपी करार – ऐसे स्‍वीकरण एवं समाप्ति भागीदारों के परस्‍पर अधिकारों एवं कर्तव्‍यों को बदल देंगी । अत: पूरक एलएलपी करार आवश्‍यक होगा, जिसे परिवर्तन के 30 दिनों के भीतर ई फार्म 3 में सशुल्‍क भरा जाना होगा  (इससे बचने हेतु एलएलपी करार उपयुक्‍त रूप से तैयार किया जा सकता है) ।  
  • लेखा एवं शोधन क्षमता की विवरणी –  यह विवरण प्रतिवर्ष ईफार्म 8 में (शुल्‍क सहित) भरी जारी होती है । इसे प्रति वित्‍त वर्ष की समाप्ति के 6 माह के भीतर अर्थात 30 अक्‍टूबर तक भरा जाना चाहिए । 
  • वार्षिक रिटर्न  – यह वित्‍त वर्ष की समाप्ति के 60 दिनों के भीतर कंप‍नी रजिस्‍ट्रार को ईफार्म 11 में भरा जाना चाहिए । इस रिटर्न में हुए विलंब पर प्रतिदिन 100 रुपए की दर से दंड लगता है ।   

दस्‍तावेजों का निरीक्षण  – निगमन दस्‍तावेज (फार्म 2), वार्षिक रिटर्न (फार्म11), एसएएस (फार्म 8) एवं भागीदारों के नाम व कोई बदलाव (फार्म 3) जनता के निरीक्षण हेतु सशुल्‍क उपलब्‍ध कराए जाते हैं । तथापि, एलएलपी करार, जनता के निरीक्षण हेतु उपलब्‍ध नहीं होता है ।

सूचना  http://www.dateyvs.com/limited_liability_partnership.htm से एकत्र की गई है ।

प्राइवेट लिमिटेड कंपनी

 

प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को न्यूनतम 2 और अधिकतम 50 सदस्यों के ऐसे स्वैच्छिक संगठन के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसकी देयता सीमित होती है, जिसके शेयरों का हस्तांतरण सीमित होता है और जिसे अपने शेयरों अथवा डिबेंचरों में अभिदान करने के लिए सामान्य जनता को आमंत्रित करने की अनुमति नहीं होती। प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं :

  • स्वतंत्र विधिक अस्तित्व

  • गठन और परिचालन कम बोझिल होता है क्योंकि इसे ऐसे अनेक नियमों तथा विनियमों से छूट मिली होती है, जिनका पालन करना पब्लिक लिमिटेड कंपनी के लिए आवश्यक होता है। उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

    • स्वतंत्र विधिक अस्तित्व

    • प्रॉस्पेक्टस दाखिल करने की जरूरत नहीं

    • कारोबार शुरू करने के लिए प्रमाणपत्र प्राप्त करने की जरूरत नहीं।

    • सांविधिक साधारण बैठक आयोजित करने तथा सांविधिक रिपोर्ट दाखिल करने की जरूरत नहीं

    • पब्लिक लिमिटेड कंपनी के निदेशकों पर लागू प्रतिबंध इसके निदेशकों पर लागू नहीं होते।

 

  • इसके सदस्यों की देयता सीमित होती है। 

  • आवंटित शेय़र सदस्यों के बीच स्वतंत्र रूप से अंतरणीय नहीं होते।
     

  • सतत अस्तित्व
     

  • पंजीकृत कार्यालय और नाम की आवश्यकता 

  • संस्था के अंतर्नियम औऱ संस्था के बहिर्नियम हस्ताक्षरित रूप में होने आवश्यक


 

अधिक जानकारी के लिए पढ़ें - हाउ टु इनकार्पोरेट योर बिजनेस
 

लाभ

हानि

सतत अस्तित्व

शेयर स्वतंत्र रूप से हस्तातंरणीय नहीं

सीमित देयता

शेयरों में अभिदान के लिए सामान्य जनता को आमंत्रित करने की इजाजत नहीं

कम वैधानिक प्रतिबंध

 

 

उपयुक्तता : जो लोग सीमित देयता का लाभ उठाना चाहते हैं पर साथ ही कारोबार पर नियंत्रण सीमित दायरे में ही रखना चाहते हैं और अपने कारोबार की निजता बनाए रखना चाहते हैं, उनके लिए यह स्वरूप उपयुक्त है।

 

सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी

 

सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी सदस्यों का एक स्वैच्छिक संगठन है, जो निगमित होता है और इसलिए जिसका एक पृथक विधिक अस्तित्व होता है और जिसके सदस्यों की देयता सीमित होती है। प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं :

  • पृथक विधिक अस्तित्व

  • भारतीय कंपनी अधिनियम, 1956 द्वारा शासित
     

  • न्यूनतम 7 सदस्य, अधिकतम की सीमा नहीं 

  • शेयर के जरिए पूंजी जुटाती है
     

  • शेयर मुक्त रूप से हस्तांतरणीय होते हैं और इसके लिए कंपनी को पहले से कोई नोटिस नहीं देना होता 

  • कंपनी के सदस्य की देयता उसके द्वारा धारित शेयरों के अंकित मूल्य तक सीमित होती है। 

  • शेयरधारकों को प्रबंधन अधिकार नहीं होते। इससे स्वामित्व और प्रबंधन का पृथक्करण सुनिश्चित होता है।. निर्णय करने की शक्ति निदेशक मंडल को दी जाती है। 

  • शेयरधारकों के दिवालियापन या मृत्यु से कंपनी के अस्तित्व को खतरा नहीं होता। 

लाभ

हानि

सतत अस्तित्व

 

पूंजी की अपेक्षाकृत बड़ी राशि

 

निर्देश की एकता

अन्य व्यवसाय स्वरूपों की तुलना में इस पर अधिक विनियमन लागू हो सकता है।

दक्ष प्रबंधन

 

सीमित देयता