Frequently Asked Questions

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  • When an unauthorised user uses a geographical indication that indicates or suggests that such goods originate in a geographical area other than the true place of origin of such goods in a manner which mislead the public as to the geographical origin of such goods.
  • When the use of geographical indication result in an unfair competition including passing off in respect of registered geographical indication.
  • When the use of another geographical indication results in false representation to the public that goods originate in a territory in respect of which a registered geographical indication relates.

The registered proprietor or authorised users of a registered geographical indication can initiate an infringement action.

No. A geographical indication is a public property belonging to the producers of the concerned goods. It shall not be the subject matter of assignment, transmission, licensing, pledge, mortgage or such other agreement. However, when an authorised user dies, his right devolves on his successor in title.

Yes. The Appellate Board or the Registrar of Geographical Indications has the power to remove the geographical indication or an authorised user from the register. Further, on application by an aggrieved person action can be taken.

A trade mark is a sign which is used in the course of trade and it distinguishes goods or services of one enterprise from those of other enterprises. Whereas a geographical indication is an indication used to identify goods having special characteristics originating from a definite geographical territory.

 The Government of India has enacted the Micro, Small and Medium Enterprises Development (MSMED) Act, 2006 in terms of which the definition of micro, small and medium enterprises is as under: 

  •  Enterprises engaged in the manufacture or production, processing or preservation of goods as specified below:
  1.  A micro enterprise is an enterprise where investment in plant and machinery does not exceed Rs. 25 lakh;
  2.  A small enterprise is an enterprise where the investment in plant and machinery is more than Rs. 25 lakh but does not exceed Rs. 5 crore; and
  3.  A medium enterprise is an enterprise where the investment in plant and machinery is more than Rs.5 crore but does not exceed Rs.10 crore.

In case of the above enterprises, investment in plant and machinery is the original cost excluding land and building and the items specified by the Ministry of Small Scale Industries vide its notification No.S.O.1722(E) dated October 5, 2006  

  •  Enterprises engaged in providing or rendering of services and whose investment in equipment (original cost excluding land and building and furniture, fittings and other items not directly related to the service rendered or as may be notified under the MSMED Act, 2006 are specified below.
  1. A micro enterprise is an enterprise where the investment in equipment does not exceed Rs. 10 lakh;
  2. A small enterprise is an enterprise where the investment in equipment is more than Rs.10 lakh but does not exceed Rs. 2 crore; and
  3. A medium enterprise is an enterprise where the investment in equipment is more than Rs. 2 crore but does not exceed Rs. 5 crore.

Cluster based approach to lending is intended to provide a full-service approach to cater to the diverse needs of the MSE sector which may be achieved through extending banking services to recognized MSE clusters. A cluster based approach may be more beneficial (a) in dealing with well-defined and recognized groups (b) availability of appropriate information for risk assessment (c) monitoring by the lending institutions and (d) reduction in costs.The banks have, therefore, been advised to treat it as a thrust area and increasingly adopt the same for SME financing. United Nations Industrial Development Organisation (UNIDO) has identified 388 clusters spread over 21 states in various parts of the country. The Ministry of Micro, Small and Medium Enterprises has also approved a list of clusters under the Scheme of Fund for Regeneration of Traditional Industries (SFURTI) and Micro and Small Enterprises Cluster Development Programme (MSE-CDP) located in 121 Minority Concentration Districts. Accordingly, banks have been advised to take appropriate measures to improve the credit flow to the identified clusters of micro and small entrepreneurs from the Minorities Communities residing in the minority concentrated districts of the country.

The Ministry of MSME, Government of India and SIDBI set up the Credit Guarantee Fund Trust for Micro and Small Enterprises ( CGTMSE) with a view to facilitate flow of credit to the MSE sector without the need for collaterals/ third party guarantees. The main objective of the scheme is that the lender should give importance to project viability and secure the credit facility purely on the primary security of the assets financed. The Credit Guarantee scheme (CGS) seeks to reassure the lender that, in the event of a MSE unit, which availed collateral- free credit facilities, fails to discharge its liabilities to the lender, the Guarantee Trust would make good the loss incurred by the lender up to 85 per cent of the outstanding amount in default.

The CGTMSE would provide cover for credit facility up to Rs. 100 lakh which have been extended by lending institutions without any collateral security and /or third party guarantees. A guarantee and annual service fee is charged by the CGTMSE to avail of the guarantee cover. Presently the guarantee fee and annual service charges are to be borne by the borrower.

Credit rating is not mandatory but it is in the interest of the MSE borrowers to get their credit rating done as it would help in credit pricing of the loans taken by them from banks.

व्यक्ति को निम्नलिखित परिस्थितियों में पेटेन्ट कार्यालय से पूर्व अनुमति लेना अपेक्षित हैः

क)आवेदन अनिवासी भारतीय हो और आविष्कार भारत में हुआ हो,

ख) आवेदक विदेश में पेटेंट-आवेदन जमा करने से पहले भारत में आवेदन करना नहीं चाहता हो,

ग) यदि आवेदक भारतीय नागरिक हो तो पेटेन्ट का आवेदन भारत में जमा कर दिया गया हो और उस तारीख से छह महीने का समय अभी व्यतीत न हुआ हो, तथा

घ) आविष्कार परमाणु ऊर्जा से अथवा रक्षा उद्देश्य से संबंधित हो।

सामान्यतः निम्नलिखित परिस्थितियों में विदेश में पेटेन्ट आवेदन जमा करने के लिए पेटेन्ट कार्यालय की पूर्व अनुमति लेना आवश्यक नहीं हैः

क) जब आवेदक भारत का निवासी न हो और आविष्कार विदेश में हुआ हो।

ख) यदि आवेदक भारत का निवासी हो और भारत में पेटेन्ट आवेदन जमा किया गया हो तथा उस तारीख से छह महीने का समय बीत चुका हो।

ग) आविष्कार परमाणु ऊर्जा अथवा रक्षा के उद्देश्यों से संबंधित न हो।

अन्य परिस्थितियों में, पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है। और अधिक विवरणों के लिए कृपया पेटेन्ट अधिनियम 1970 की धारा 39 देखें।

is required.  For further details kindly refer to section 39 of the Patents Act, 1970.

किसी आविष्कार को पेटेंटयोग्य सामग्री होने के लिए निम्नलिखित मानदंड पूरे करने चाहिए

i) यह नवीन होना चाहिए

ii) इसमें आविष्कारी चरण होना चाहिए अथवा यह नॉन-ओबियस होना चाहिए।

iii) उसमें इतनी क्षमता होनी चाहिए कि उसका औद्योगिक अनुप्रयोग हो सके।

iv) यह पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 3 और 4 के प्रावधानों के अंतर्गत नहीं आना चाहिए।


नहीं। यह आवेदक और पेटेन्ट एजेन्ट के बीच का मामला है। पेटेन्ट एजेन्ट जो शुल्क लेता है उसका पता लगाने में या उसमें मदद करने में पेटेन्ट कार्यालय की कोई भूमिका नहीं है।.

नहीँ। पेटेन्ट कार्यालय पेटेन्ट एजेन्ट के चयन के लिए कोई संस्तुति नहीं करता। किन्तु आवेदक को स्वतंत्रता रहती है कि वह कार्यालय द्वारा तैयार की गई पेटेन्ट एजेंटों की सूची में से कोई भी पेटेन्ट एजेन्ट नियुक्त कर ले। यह सूची पेटेन्ट कार्यालय की वेबसाइट पर देखी जा सकती है।

नहीं। पेटेन्ट कानून के अंतर्गत पेटेन्ट के लिए आवेदन करने के लिए किसी पंजीकृत पेटेन्ट एजेन्ट की सेवाएँ लेना आवश्यक नहीं है। आवेदक अपने-आप या पेटेन्ट एजेन्ट के माध्यम से आवेदन जमा करने के लिए स्वतंत्र है। किन्तु यदि कोई आवेदक भारत का नागरिक न हो तो उसे या तो पंजीकृत एजेन्ट के माध्यम से आवेदन जमा करना होता है या उसे तामील के लिए भारत का कोई पता देना होता है।

पेटेन्ट एजेन्ट भारतीय पेटेन्ट कार्यालय में पंजीकृत व्यक्ति होता है, और पेटेन्ट कार्यालय द्वारा आयोजित परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उसका नाम पेटेन्ट एजेन्ट रजिस्टर में दर्ज़ किया जाता है। वह निम्नलिखित के लिए पात्र होता है—

(a) नियंत्रक के यहाँ प्रैक्टिस करना और

(b)सभी दस्तावेज दैयार करना, समस्त कार्य एवं ऐसे प्रकार्य निष्पादित करना जो  इस अधिनियम के अंतर्गत कंट्रोलर के यहाँ जारी प्रक्रिया के संबंध में निर्दिष्ट हों।

पेटेन्ट एजेन्ट के रूप में पंजीकरण की पात्रता शर्तें इस प्रकार हैं.-

कोई व्यक्ति यदि निम्नलिखित शर्तों को पूरा करता है तो वह पेटेन्ट एजेन्ट के रजिस्टर में अपना नाम लिखाने के लिए अर्ह होगा—

(क) वह भारत का नागरिक हो;

(ख) वह 21 वर्ष का हो चुका हो;

(ग) उसने विज्ञान, इंजीनियरिंग अथवा प्रौद्योगिकी में किसी ऐसे विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त की हो जो इस समय प्रचलित कानून के अनुसार भारत की सीमा में स्थापित हो अथवा जिसके पास केन्द्र सरकार द्वारा इस बारे में विनिर्दिष्ट कोई समतुल्य योग्यता हो।

और साथ ही, जिसने—

(i) इस उद्देश्य से लिए निर्धारित परीक्षा उत्तीर्ण की हो; अथवा

(ii) कम से कम दस वर्ष तक या तो परीक्षक के रूप में काम किया हो या धारा 73 के अंतर्गत नियंत्रक का कामकाज देखा हो या दोनों काम किए हों, किन्तु अब ऐसे किसी पद पर न हो।

पेटेन्ट के स्थगन के 18 महीने के भीतर उसके रिस्टोरेशन के लिए अनुरोध किया जा सकता है। सथा में निर्धारित शुल्क जमा करना होता है। अनुरोध मिलने के बाद मामले को आगे की कार्रवाई के लिए सरकारी जर्नल में अधिसूचित किया जाता है।



पेटेन्ट मिलने के बाद हर पेटेन्ट करानेवाले को प्रत्येक वर्ष अनुसूची  I में निर्धारित नवीकरण शुल्क अदा करके पेटेन्ट कायम रखना होता है। पहले दो वर्ष तक कोई नवीकरण शुल्क नहीं होता। नवीकरण शुल्क तीसरे वर्ष और उसके पश्चात् देय होता है। नवीकरण शुल्क अदा नहीं करने पर पेटेन्ट स्थगित हो जाएगा।

हाँ। किसी व्यक्ति (प्राकृतिक व्यक्ति) के आवेदन जमा करने का शुल्क रु. 1,000/- है जबकि व्यक्ति से इतर किसी विधिक सत्ता के आवेदन जमा करने का शुल्क 10 दावों और 30 पृष्ठों तक रु. 4,000/- है। किन्तु यदि पृष्ठों की संख्या 30 से अधिक हो तो प्राकृतिक व्यक्ति को हर अतिरिक्त पृष्ठ के लिए रु. 100/- और प्राकृतिक व्यक्ति से इतर व्यक्ति को प्रति पृष्ठ रु. 400/- अदा करने होंगे। इसी प्रकार यदि दावों की संख्या 10 से अधिक हो तो प्राकृतिक व्यक्ति को प्रत्येक अतिरिक्त दावे के लिए रु. 200/- तथा प्राकृति व्यक्ति से इतर व्यक्ति को प्रत्येक अतिरिक्त दावे के लिए रु. 800/- अदा करने होंगे।

भारत में हर पेटेन्ट की मियाद पेटेन्ट आवेदन जमा करने की तारीख से 20 वर्ष तक होती है, चाहे वह अनन्तिम रूप से जमा किया गया हो या पूरे ब्यौरों के साथ। किन्तु पीसीटी के अंतर्गत जमा किए गए आवेदनों के मामले में 20 वर्ष की अवधि अंतरराष्ट्रीय आवेदन-तारीख से शुरू होती है।

संबंधित व्यक्ति पेटेन्ट कार्यालय की वेबसाइट पर इंडियन पेटेन्ट डाटा बेस में प्रदत्त पेटेन्ट के अंतर्गत अथवा पेटेन्ट कार्यालय द्वारा हर सप्ताह जारी जर्नल में अथवा पेटेन्ट कार्यालय के सर्च व रिफरेन्स रूम में रखे दस्तावेजों को देख एक प्राथमिक सर्च कर सकता है, जिसमें भारतीय पेटेन्टों की जानकारी अंतरराष्ट्रीय पेटेन्ट वर्गीकरण प्रणाली के साथ-साथ, क्रम संख्या के अनुसार दी गई रहती है। यह आम जनता के लिए सोमवार से शुक्रवार तक खुलता है और राजपत्रित छुट्टियों में बंद रहता है। जनता पेटेन्ट कार्यालय की वेबसाइट पर निश्शुल्क सर्च भी कर सकती है। संबंधित व्यक्ति इस तरह की जानकारी के अधिनियम की धारा 153 के तहत भी अनुरोध कर सकते हैं।

पेटेन्ट के वाणिज्यीकरण में पेटेन्ट कार्यालय की कोई भूमिका नहीं होती। किन्तु पेटेन्ट संबंधी जानकारी पेटेन्ट कार्यालय के जर्नल में छापी जाती है  और पेटेन्ट कार्यालय की वेबसाइट पर भी डाली जाती है, जो पूरी दुनिया में आम आदमी की पहुँच में है। इससे निश्चय ही आवेदक को लाइसेन्स के भावी उपयोगकर्ताओं को आकर्षित करने में मदद मिलती है। पेटेन्ट कार्यालय ऐसे पेटेन्टों की सूची भी तैयार करता है, जिनका भारत में वाणिज्यिक रूप से इस्तेमाल नहीं होता।

 पेटेन्ट के लिए आवेदन जमा करने के बाद किसी उत्पाद पर "पेटेन्ट लंबित" या "पेटेन्ट आवेदित" अंकित करने का आशय जनता को सूचित करना है कि पेटेन्ट के लिए आवेदन पेटेन्ट कार्यालय में लंबित है। किन्तु इन शब्दों का कोई विधिक महत्त्व नहीं है। पेटेन्ट मिलने के बाद ही उसके उल्लंघन को रोकने की कार्रवाई की जा सकती है।

पंजीकृत प्रवर्तक का नाम, पता अथवा सेवा का पता डिज़ाइन के रजिस्टर में बदला जा सकता हॆ बशर्ते यह बदलाव हस्तांतरण, यथा समनुदेशन, प्रेषण, लाइसेंस करार अथवा विधि के परिचालन के द्वारा नहीं किया जा रहा हॆ, जिसके लिये प्रश्न सं 21 के उत्तर को देखें। रु 200/- के शुल्क के साथ फ़ार्म 22 में आवेदन डिज़ाइन नियंत्रक के समक्ष सभी आवश्यक द्स्तावेज़ों के साथ प्रस्तुत किया जाना होता हॆ।