आपके व्‍यवसाय का निधीयन

Fund Your Business

किसी व्‍यवसाय जीवन चक्र के प्रत्‍येक चरण पर वित्‍तीयन आवश्‍यक होता है । एमएसएमई इकाइयों को लगाने एवं उनके परिचालनों को बढ़ाने तथा नए उत्‍पाद विकसित करने हेतु वित्‍तीयन आवश्‍यक है । भारत के पास एक सुवि‍कसित वित्‍तीय प्रणाली है, जिसमें बैंक, वित्‍तीय संस्‍थान, गैर बैंकिंग वित्‍तीय कंपनियां एवं उद्यम पूंजी कंपनियां शामिल हैं । ये सभी संस्‍थाएं इस उद्योग की विविध वित्‍तीय जरूरतों को पूरा करती हैं। एमएसएमई इकाइयों की वित्‍तीय जरूरतों को पूरा करने हेतु विभिन्‍न बैंकों व वित्‍तीय संस्‍थाओं द्वारा विभिन्‍न योजनाएं कार्यान्वित की जा रही हैं ।

वित्तीयन के विभिन्न प्रकार

Modes of Financing

एक व्यवसाय उद्यम के लगभग प्रत्येक व्यवसाय चरण में वित्त की आवश्यकता होती है। एमएसएमई अपने परिचालन और साथ ही साथ विस्तार व संवृद्धि के लिए पर्याप्त वित्त की व्यवस्था करने में अक्सर कठिनाई का सामना करते हैं। ये उद्यम विभिन्न विधियों से वित्त जुटा सकते हैं। नीचे कुछ उपाय दिए गए हैं, जिनसे दीर्घावधि एवं अल्पावधि पूँजी जुटाई जा सकती है। 

दीर्घावधि पूँजी के स्रोत

लाभ का पुनर्निवेश

लाभप्रद कंपनियाँ सामान्यत: अपने लाभ की पूरी राशि लाभांश के रूप में नहीं बाँटते हैं, बल्कि कुछ अंश आरक्षित निधि में अंतरित कर देते हैं। इसे लाभ का पुनर्निवेश माना जा सकता है। चूँकि लाभ की ऐसी प्रतिधारित राशि कंपनी के शेयरधारकों की होती है, अत: उसे स्वामित्व पूँजी का हिस्सा माना जाता है। लाभ का प्रतिधारण एक प्रकार से व्यवसाय का स्व-वित्तपोषण है। लाभ प्रतिधारित करते जाने से कुछ वर्षों के दौरान अच्छी आरक्षित निधि बन जाती है और कंपनी इसे निम्नलिखित प्रयोजनों के लिए उपयोग कर सकती है :

  • उपक्रम का विस्तार
  • पुरानी आस्तियों को प्रतिस्थापित करना और आधुनिकीकरण
  • स्थायी या विशेष कार्यशील पूँजी आवश्यकताओं की पूर्ति
  • पुराने ऋणों का मोचन

कंपनी को वित्त के इस स्रोत के निम्नलिखित लाभ हैं :

  • इससे वित्त के बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम हो जाती है।
  • इससे कंपनी की ऋण-सुपात्रता में वृद्धि होती है।
  • इसके कारण कंपनी कठिन परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम होती है।
  • इससे कंपनी की लाभांश नीति को स्थिरता मिलती है।


वाणिज्य बैंकों से ऋण

कंपनियाँ संपत्तियों और आस्तियों की प्रतिभूति के प्रति वाणिज्य बैंकों से मध्यम अवधि के सावधि ऋण प्राप्त कर सकती हैं। आस्तियों के आधुनिकीकरण और पुनरुद्धार के लिए अपेक्षित निधियाँ बैंकों से उधार ली जा सकती हैं। आस्तियों के बंधक को छोड़कर, वित्तीयन की इस विधि के लिए किसी अन्य विधिक औपचारिकता की आवश्यकता नहीं होती है।


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वित्तीय संस्थाओं से ऋण

कंपनियाँ वित्तीय संस्थाओं, जैसे – औद्योगिक वित्त निगम लि., राज्य स्तरीय औद्योगिक विकास निगम, आदि से दीर्घावधि एवं मध्यम अवधि के सावधि ऋण प्राप्त कर सकती हैं। ये वित्तीय संस्थाएँ अनुमोदित योजनाओं और परियोजनाओं के के प्रति अधिकतम 25 वर्ष के लिए ऋण उपलब्ध कराती हैं। मंजूरी के ले सहमत ऋण के प्रति कंपनी की संपत्ति के बंधक या स्टॉक, शेयर, स्वर्ण, आदि के समनुदेशन के माध्यम से प्रतिभूति दी जानी अनिवार्य होती है।  


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सार्वजनिक जमाराशियाँ

कंपनियाँ अक्सर अपने शेयरधारकों, कर्मचारियों और आम जनता से उनकी बचतराशियाँ कंपनी के पास जमा करने का अनुरोध करती हैं। कंपनी अधिनियम में यह अनुमति है कि ऐसी जमाराशियाँ तीन वर्ष तक की अवधि के लिए प्राप्त की जा सकती है। कंपनियाँ अपनी मध्यम अवधि और अल्पावधि वित्तीय आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए सार्वजनिक जमाराशियाँ जुटाई जा सकती है। सार्वजनिक जमाराशियों की बढ़ती लोकप्रियता निम्नलिखित के कारण है :

  • कंपनियों को इन जमाराशियों पर जो ब्याज देना पड़ता है, वह बैंक ऋण पर दी जाने वाली ब्याजदर से कम होता है।
  • यह बैंकों की तुलना में निधि संग्रह का सरल तरीका है, विशेष रूप से ऋम मंदी की अवधि में।
  • ये अप्रतिभूत होते हैं।

वाणिज्य बैंकों के विपरीत, कंपनी को ऋण प्राप्त करने के लिए अपनी ऋण-सुपात्रता सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती है।


जोखिम पूँजी

जोखिम पूँजी पूँजी के उस प्रावधान को दर्शाती है, जिसमें प्रदाता उद्यमी का जोखिम बोझ कम करता है, और बदले में, उत्पादक गतिविधि में शामिल समग्र जोखिम का कुछ हिस्सा स्वयं वहन करता है। भारत में व्यापक रूप से प्रयुक्त परिभाषा के अनुसार “जोखिम पूँजी” शब्दपद में ईक्विटी और साथ ही साथ मेज़नीन /अर्द्ध-ईक्विटी वित्तीय उत्पाद, जिसमें ऋण और ईक्विटी दोनों के गुण होते हैं, शामिल होते हैं। जोखिम पूँजी न केवल नवारंभ एवं नवोन्मेषी /तेजी से वृद्धि करने वाली इकाइयों के लिए महत्त्वपूर्ण लिखत है, बल्कि उन कंपनियों के लिए भी महत्त्वपूर्ण है, जो संवृद्धि करना चाहती है। जोखिम पूँजी  प्रवर्तक अंशदान को प्रतिस्थापित करती है, जिससे उद्यमी द्वारा लाई जाने वाली पूँजी में कमी होती है। ऐसे मामलों में, जोखिम पूँजी एमएसएमई के लिए पूँजी जुटाने के सर्वाधिक व्यवहार्य विकल्पों में से एक है। एमएसएमई के लिए जोखिम पूँजी जुटाने के उपलब्ध प्रमुख विकल्पों में उद्यम पूँजी, ऐन्जल निवेश तथा सार्वजनिक सूचीबद्धता शामिल हैं।

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शेयर जारी करना

यह सर्वाधिक मह्त्त्वपूर्ण विधि है। शेयरधारक की देयता शेयर के अंकित मूल्य तक सीमित होती है और वह भी सरलता से हस्तांतरणीय होती है। एक निजी कंपनी अपनी शेयर पूँजी के प्रति अंशदान के लिए आम जनता को आमंत्रित नहीं कर सकती है और उसके शेयर भी मुक्त रूप से हस्तांतरणीय नहीं होते हैं। किंतु पब्लिक लिमिटेड कंपनी के लिए, ऐसे कोई प्रतिबंध नहीं हैं। शेयर दो प्रकार के होते हैं :-

  • ईक्विटी शेयर : इन शेयरों पर लाभांश की दर उपलब्ध लाभ और निदेशकों को प्राप्त विवेकाधिकार पर निर्भर करती है। अत: कंपनी पर कोई निर्धारित बोझ नहीं होता है। प्रत्येक शेयर को एक मत (वोट) का अधिकार होता है।
  • अधिमान शेयर : इन शेयरों पर एक नियत दर पर देय होता है और वह केवल उस स्थिति में देय होता है, जब लाभ कमाया गया हो। अत: कंपनी की वित्तीय स्थिति पर कोई अनिवार्य बोझ नहीं होता है। इन शेयरों को मत (वोट) अधिकार नहीं होता है।


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डिबेन्चर जारी करना

कंपनियों को सामान्यत: डिबेन्चर जारी कर उधार और ऋण लेने की शक्तियाँ प्राप्त होती है।  डिबेन्चरों पर अदा की जाने वाली ब्याजदर उसे जारी करने के समय ही स्थिर होती है और वह कंपनी की संपत्ति एवं आस्तियों पर प्रभार के माध्यम से प्रतिभूत होती है, जो भुगतान के लिए आवश्यक सुरक्षा प्राप्त उपलब्ध कराती है। कंपनी को ब्याज का भुगतान करना होता है, चाहे लाभ हो या न हो। डिबेन्चर अधिकतर दीर्घावधि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जारी किए जाते हैं और इन्हें कोई मताधिकार नहीं होता है। 

अल्पावधि सावधि पूँजी के स्रोत

व्यापार उधार

कंपनियाँ विभिन्न आपूर्तिकर्ताओं से उधार पर कच्चा माल, घटक, भांडार और पुर्जे खरीदती हैं। सामान्यत: आपूर्तिकर्ता 3 से 6 माह की अवधि के लिए उधार मंजूर करते हैं और इस प्रकार कंपनी को अल्पावधि वित्त प्रदान करते हैं। इस प्रकार का वित्त उपलब्ध होना व्यवसाय की मात्रा से जुड़ा होता है। जब सामानों का उत्पादन और बिक्री बढ़ती है, तो स्वत: ही खरीदारी की मात्रा बढ़ जाती है और अधिक व्यापार उधार उपलब्ध होता है। 


फ़ैक्टरिंग

उधार बिक्री के कारण ग्राहक से किसी कंपनी को देय राशियाँ सामान्यत: अनुमत उधार की अवधि के दौरान अर्थात् देनदार से देयराशियाँ वसूल किए जाने तक, बकाया रहती हैं। बही ऋण किसी बैंक को सौंप दिए जाते हैं और बैंक से अग्रिम रूप में नक़द राशि प्राप्त कर ली जाती है। इस प्रकार, कंपनी से विनिर्दिष्ट प्रभार का भुगतान किए जाने पर देनदार से शेष राशि वसूल किए जाने का दायित्व बैंक अधिगृहीत कर लेता है। अल्पावधि जुटाने की यह विधि फ़ैक्टरिंग कहलाती है। इस प्रयोजन के लिए देय प्रभारों को निधियाँ जुटाने की लागत मानी जाता है। 


विनिमय बिल की भुनाई

अल्पावधि वित्त जुटाने के लिए कंपनियाँ इस विधि का व्यापक रूप से उपयोग करती हैं। जब सामान उधार पर बेचा जाता है, तो सामान्यत: सामान के क्रेताओं की स्वीकृति के लिए विनिमय बिल तैयार के किए जाते हैं। ऐसे बिलों को परिपक्वता तिथि तक धारित रखने के बजाय कंपनियाँ बैंक प्रभार (जिसे बैंक का बट्टा कहा जाता है) का भुगतान कर उन्हें वाणिज्य बैंकों से भुना सकती है। बैंक जिस दर पर भुनाई करते हैं, उसका निर्धारण समय-समय पर रिज़र्व बैंक करता है। भुनाई करते समय बिल की राशि में से भुनाई की राशि काट ली जाती है। इस विधि से वित्त जुटाने की लागत वह होती है, जो बैंक बट्टे के रूप में लेते हैं। 

 

एनटीआरईईएस ई-भुनाई के लिए व्यापारगत प्राप्यराशि इंजन

आपूर्तिकर्ताओं, विशेष रूप से एमएसएमई के खातों की प्राप्यराशियों की ई-भुनाई के लिए एक इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफ़ॉर्म की स्थापना के लिए सिडबी और एनएसई के बीच सहयोग की सहमति हुई है। प्लेटफ़ॉर्म का नाम एनटीआरईईएस है, जो क़ाग़ज-आधारित भौतिक कार्यविधि के स्थान पर ई-व्यापार स्थापित करेगा, जिससे बिल भुनाई के संव्यवहार किफ़ायती, शीघ्रतापूर्ण और अधिक पारदर्शी हो जाएँगे। यह गतिविधि आपूर्तिकर्ताओं विशेष रूप से एमएसएमई की चलनिधि समस्या के प्रभावी और दक्षतापूर्ण समाधान के लिए तैयार किया गया है और इसलिए इसके संव्यवहार इसे स्वपोषित बनाए रखते हैं।   


एमएसएमई आज जिन प्रमुख चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, उनमें एक है उपयुक्त लागत पर पूँजी आवश्यकताओं की पूर्ति। एनटीआरईईएस एमएसएमई की इन चुनौतियों का समाधान करने वाला एक अनुपम एवं उत्साहवर्द्धक प्लेटफ़ॉर्म है।

एनटीआरईईएस के बारे में अधिक जानने के लिए 
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बैंक ओवरड्रॉफ्ट एवं नक़द उधार

अल्पावधि वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यह एक आम विधि है, जो कंपनियाँ उपयोग करती हैं। नक़द उधार एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके अधीन वाणिज्य बैंक एक निर्दिष्ट सीमा के अंदर समय-समय पर अग्रिम रूप से राशियाँ आहरित किए जाने की अनुमति देते हैं। यह सुविधा भंडार में उपलब्ध सामान-भांडार, या दूसरे हस्ताक्षर के साथ वचनपत्र, या विपणन-योग्य अन्य लिखतों, जैसे सरकारी बांड की प्रतिभूति के प्रति दी जाती है। ओवरड्रॉफ़्ट बैंक के साथ एक अस्थायी व्यवस्था है, जिसमें कंपनी को एक निश्चित सीमा तक बैंक में स्थित अपने चालू जमाखाते से  अग्रिम रूपी अधिक राशि आहरित करने की अनुमति हौती है। ओवरड्रॉफ़्ट सुविधा प्रतिभूतियों के प्रति भी दी जाती है। नक़द उधार और ओवरड्रॉफ़्ट पर लगाई जाने वाली ब्याजदर बैंक जमाराशियों पर लगाए जाने वाली दर की अपेक्षा काफी अधिक होती है। 


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इक्विटी सहायता और जोखिम पूंजी

Equity Support

समय से और पर्याप्त निधियों का उचित मूल्य पर न मिल पाना एमएसएमई क्षेत्र के सामने आनेवाली सबसे महत्त्वपूर्ण समस्याओं में से एक है। इस क्षेत्र को बैंक वित्त की कम उपलब्धता के कुछ प्रमुख कारण हैं- उच्च जोखिम अवधारणा, आंकड़ों और बाहरी क्रेडिट रेटिंग की अपर्याप्तता, कमजोर कॉर्पोरेट वित्तीय प्रणालियाँ, शुरुआती चरण में छोटे ऋणों की उच्च ट्रांजेक्शन लागत और एमएसएमई को उधार देनेवाले बैंकों की ऊँची कीमतें। पर्याप्त कोलैटरल की कमी इस क्षेत्र को धन की उपलब्धता को और भी बाधित करती है। ऐसी स्थितियों में एमएसएमई क्षेत्र को जोखिम पूँजी के विभिन्न विकल्प उपलब्ध कराना जरूरी है।

जोखिम पूँजी न केवल शुरुआती कंपनियों बल्कि नवोन्मेषी/ तेजी से बढ़ रही कंपनियों के लिए महत्त्वपूर्ण साधन है। वृद्धि के लिए प्रयासरत कंपनियों के लिए भी यह महत्त्वपूर्ण है। किन्तु विकासशील देशों में जोखिम पूँजी के स्रोत सीमित हैं। ज्यादातर एमएसएमई मालिक के चलाए चलती हैं। औपचारिक संरचनाओं के लिए इनमें बहुत कम रुझान होता है। भारत में ज्यादातर एमएसएमई की संरचना गैर-कॉर्पोरेट होने तथा उनका आकार छोटा होने के कारण वेंचर कैपिटलिस्ट और अन्य जोखिम पूँजी प्रदाता उनमें निवेश करने के अनिच्छुक रहते हैं, क्योंकि उनकी ट्रैंजेक्शन लागत अधिक होती है और ऐसे निवेशों से निकल पाना कठिन होता है। इस प्रकार अलग-अलग आकारों और संरचना वाले एमएसएमई के लिए उचित जोखिम पूँजी उत्पाद तथा फोकस्ड निधियों का होना महत्त्वपूर्ण है।

अंतरराष्ट्रीय रूप से और भारत में एमएसएमई क्षेत्र के लिए उपलब्ध कुछ प्रमुख जोखिम पूँजी विकल्प इस प्रकार हैः

वेंचर कैपिटलः

वेंचर फंड विशेष रूप से ईक्विटी प्रदान करते हैं। वे निश्चित स्रोत से ऋण प्रदान कर भी सकते हैं और नहीं भी। अच्छी गुणवत्तायुक्त वेंचर फंडिंग से कंपनी की क्रेडिट रेटिंग सुधर सकती है, जिससे यह वाणिज्यिक ऋण अथवा अन्य प्रकार का वित्त हासिल कर सकती है। किन्तु एग्जिट में कुछ अपेक्षित समस्याएं रहती हैं जो इन क्षेत्रों में निधियों के आगमन पर असर डाल सकती हैं। इससे एमएसएमई के परिचालन संबंधी लचीलेपन में कमी आपने संभावना आदि भी संभव है।

भारत में वेचर कैपिटल के बारे में और अधिक पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। click here.
 

ऐंजल निवेशक

      ऐंजल्स विशेष रूप से उच्च नेटवर्थ वाले व्यक्ति होते हैं जो अपनी अतिरिक्त निधियों में कुछ का निवेश नए उद्यमों में करना चाहते हैं। कंपनी के विकास के शुरुआती चरण में वे पूँजी व सलाह का अच्छा स्रोत सिद्ध हो सकते हैं। निवेशक के लिए वे एमएसएमई में शुरुआती चरण में निवेश से उच्च प्रतिलाभ के अवसर लाते हैं। समस्या वाले क्षेत्र हैं- ईक्विटी बिक्री की स्थिति में बाहरी निवेशक लाने में एमएसएमई की अनिच्छा, निवेशक के लिए उच्च जोखिम और एमएसएमई प्रबंधन तथा निवेशक के बीच संबंध टूटने का जोखिम।

भारत में ऐंजल निवेशक नेटवर्क के बारे में और अधिक पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें click here.
 

पब्लिक लिस्टिंग

      अच्छे कामकाज के रिकॉर्ड वाली एमएसएमई सार्वजनिक लिस्टिंग प्रक्रिया के माध्यम से पहले प्रारंभिक पब्लिक ऑफऱ (आईपीओ) के माध्यम से आम जनता से निधियाँ ले सकते हैं। एमएसएमई के लिए चालू आईपीओ रेजीम से शुरुआती चरणों में अन्य प्रकार की जोखिम पूँजी के प्रवेश में मदद मिलेगी। किन्तु आईपीओ का रास्ता केवल बड़े एमएसएमई तक सीमित है, जिनका पिछले कामकाज का सुस्थापित व सुदृढ़ रिकॉर्ड है और बाजार में प्रतिष्ठा है।

इस तरह की जोखिम पूँजी के बारे में और अधिक पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करेंclick here .
 

इन्क्यूबेटर

इन्क्यूबेटर ऐसे सहायता कार्यक्रम हैं जो कई तरह के व्यवसाय सहायता संसाधनों और सेवाओं के माध्यम से उद्यमिता आधारित कंपनियों के सफल विकास और उन्हें आगे लाने के लिए तैयार किए जाते हैं। ये संसाधन/सेवाएं या तो इन्क्यूबेटर में या उसके संपर्कों के नेटवर्क के ज़रिए दी जाती हैं। अनुसंधान और प्रौद्योगिकी पार्कों से अलग हटकर, इन्क्यूबेटर प्रारंभिक और शुरुआती चरण की कंपनियों को समर्पित होते हैं।

इन्क्यूबेटर संभावित उद्यमियों को आरंभिक चरणों में मदद करने के साथ-साथ कई अलग-अलग तरीकों से मदद करते हैं। वे भावी उद्यमी को नेटवर्कों, वाणिज्यिक रुझान रखनेवाली मेंटरिंग आदि से भी मिलवाते हैं।

भारत में सरकार द्वारा संचालित इन्क्यूबेटरों के बारे में और अधिक जानने के लिए क्लिक करें click here .
 

 

जोखिम पूँजी के पूरक

जोखिम पूँजी के कुछ पूरकों का पता एमएसएमई भी लगा सकती हैं। इनमें निम्नलिखित वित्तीय विकल्प शामिल हैं:

ऋण निधि

प्राइवेट पूँजी का इस्तेमाल करके संरचनागत निधियों से सहायता-प्राप्त शुद्ध ऋण निधि का लाभ उठाया जा सकता है।हालांकि एमएसएमई के लिए ऋण योजनाएं पूंजी का एक प्रमुख स्रोत होती हैं, किन्तु आम तौर पर ऋण-दाताओं को कोटैरल चाहिए होता है या वे क्रेडिट स्कोरिंग प्रक्रिया अपनाते हैं, जिसमें शुरुआती कंपनियों से भेदभाव हो सकता है।
 

गारंटी संघ

गारंटी निधियाँ या गारंटी संघ शुल्क लेकर एमएसएमई को गारंटी जारी करते हैं, ताकि वे बाहर से वित्त पा सकें (जो मुख्यतः ऋण आधारित किन्तु ईक्विटी भी होता है)। यह गारंटी जोखिम और प्रशासनिक तथा प्रोसेसिंग लागतों को कवर करने के लिए होता है। इससे एमएसएमई को सुधरी हुई वित्तीय शर्तों पर ऋण के रूप में वित्त लेने तथा ऋणदाता संस्था को जोखिम की मात्रा कम करने में मदद मिलती है। किन्तु ये ऋण जोखिम की आंशिक पूर्ति ही करते हैं और अकसर वित्तीय लिखतों की एक सीमित रेंज पर लागू होते हैं।
एमएसएमई की ऋण गारंटि निधि योजना के बारे में और अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करेंclick here .

अल्प वित्त

अल्प वित्त को विशेष रूप से उस व्यवसाय के लिए बनाया गया है, जिसकी वित्तीय जरूरतें कम हैं। यह सूक्ष्म व्यवसाय आरंभ करने और विकसित करने में बाजार की विफलता को पूरा कर सकता है। किन्तु इसमें ऋण प्रदायगी की लागत अधिक आती है और साथ ही, यह केवल छोटी जरूरतों को पूरा करता है और आम तौर पर इसमें एक समरूपी तथा अच्छे नेटवर्क से जुड़े सामाजिक समूह की जरूरत होती है।

सिडबी की अल्प वित्त योजना के ब्यौरे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें, click here

ऐंजल नेटवर्क

Angel Network

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न प्रकार के बहुत से ऐंजल क्लब हैं, जो उभरते हुए उद्यमियों को जोखिम पूँजी और मेंटरिंग, दोनों प्रदान करने में बहुत सफल रहे हैं। इनमें कुछ तो बिलकुल बुनियादी चरण के उद्यमी थे। ऐंजल नेटवर्क में व्यवसाय-योजना को सभी सदस्य संक्षेप में देखते हैं जिनमें से सदस्यों का कोई एक उप-समूह व्यवसाय के वित्तीयन के लिए सहमत हो सकता है। हर सदस्य अपेक्षाकृत छोटी राशि लगाता है, पर पर्याप्त संख्या होने के कारण उद्यम को पर्याप्त वित्त मिल जाता है। ऐंजल नेटवर्क में बहुत से ऐंजल अपनी गतिविधियों का अनौपचारिक रूप से समन्वयन करते हैं। हर ऐंजल की विश्वसनीयता काफी महत्त्वपूर्ण हो जाती है और इसलिए नेटवर्क में शामिल किए जाने से पहले हर संभावित नए सदस्य को सभी पुराने सदस्यों का अनुमोदन पाना होता है।

ऐंजल नेटवर्क मॉडल की सफलता के बावजूद अभी तक भारत में बहुत कम ऐंजल नेटवर्क हैं। हाल के समय में ऐसे नेटवर्कों का विस्तार हुआ है और जैसे-जैसे अधिक से अधिक संख्या में प्रोफेशनल लोग सफलता हासिल करते जाएँगे,और अपनी निधियाँ दूसरे व्यवसायों में विशेषज्ञता निवेश करना शुरू करेंगे, वैसे-वैसे यह प्रक्रिया और आगे बढ़ेगी।

भारत में ऐंजल नेटवर्कों में से एक है- दि इंडियन ऐंजल नेटवर्क, डेली। दि इंडियन ऐंजल नेटवर्क 1996 में शुरू हुआ। यह कई तरह के क्षेत्रों के वरिष्ठ प्रबंधकों और सफल उद्यमियों को एक साथ लाता है। नेटवर्क की वेबसाइट के अनुसार इसके 70 सदस्य ऐसे हैं जिन्होंने पिछले 24 महीनों में कई तरह के क्षेत्रों जैसे सूचना प्रौद्योगिकी, मोबाइल, शिक्षा, इंटरनेट, बौद्धिक संपदा व आतिथ्य, परामर्श सेवाओं आदि में 12 निवेश किए हैं। यह नेटवर्क 100.000 अमेरिकी डॉलर से लगभग 10 लाख अमेरिकी डॉलर (यानी 45 लाख रुपये से 4.5 करोड़ रुपये) तक निवेश और किसी आईपीओ, एमएंडए या रणनीतिक बिक्री के ज़रिए 3 से 5 वर्ष के भीतर एग्जिट करता है। नेटवर्क दस लाख डॉलर से अधिक निवेश करने पर विचार कर सकता है, लेकिन ऐसा वह सिंडिकेशन (समूहन) के ज़रिए कर सकता है।

फंडिंग कराना चाहते है?

ऐंजल निवेश नेटवर्कों की मदद लीजिए, जिनमें से कुछ ये हैः

वेंचर कैपिटल

Venture Capital for MSMEs

वेचर कैपिटल लघु और मध्यम आकार की फर्मों के लिए, खासकर व्यवसाय शुरू करने और व्यवसाय को विस्तार देने के लिए फाइनेन्स के एक महत्त्वपूर्ण स्रोत के रूप में उभर रहा है। उद्यमी आम तौर पर अपने धन से और बैंकों से उधार लिए गए धन से व्यवसाय शुरू करते हैं। एक्स्पैंशन के समय उनको धन जुटाने में कठिनाई होती है। लघू और मध्यम उद्यम विस्तार के लिए और कार्यशील पूंजी आवश्यकताओं के लिए परंपरागत रूप से बैंकों पर निर्भर रहते आए हैं। किन्तु पिछले कुछ समय में मंदी के कारण गैर निष्पादक आस्तियों (एनपीए) का जोखिम बढ़ जाने की वजह से बैंकों ने लघु एवं मध्यम उद्यमों को उधार देना कम कर दिया है। इस प्रकार कई लघु एवं मध्यम उद्यमों की परियोजनाओं व एक्स्पैंशन योजनाओं के लाभप्रद होने के बावजूद उनको अपनी परियोजनाओं के लिए वित्त जुटाने में कठिनाई होती है, क्योंकि उच्च जोखिम वाली परियोजनाओं में बैंक धन नहीं लगाना चाहते।

इस तरह की उद्यमी प्रतिभा और व्यवसाय कौशल के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से वेंचर कैपिटल की अवधारणा अस्तित्व में आई है। तेजी से विकसित हो रही प्राइवेट कंपनियों के लिए वेंचर कैपिटल ईक्विटी फाइनेन्स का एक साधन है। कंपनी शुरू करने, उसके विस्तार अथवा कंपनी खरीदने के लिए वित्त की जरूरत होती है। वेंचर कैपिटलिस्टों में विभिन्न क्षेत्रों के प्रोफेशनल होते हैं। वे परियोजना की ध्यानपूर्वक जाँच करने के बाद इन फर्मों को निधियाँ (जिनको वेंचर कैपिटल फंड कहते हैं) देते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य अपने निवेश पर अधिक से अधिक प्रतिलाभ पाना होता है। लेकिन उनके तौर-तरीके परंपरागत साहूकारों से अलग होते हैं। वे कंपनी के प्रबंधन में सक्रियता से भाग लेते हैं और अच्छे बैंकर, टेक्नोलॉजिस्ट, प्लैनर व प्रबंधक के रूप में विशेषज्ञता-युक्त व गुणवत्तापूर्ण सेवा देते हैं।

भारत के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए वेंचर कैपिटल

परंपरागत रूप से भारत में वेंचर कैपिटलिस्ट एमएसएमई क्षेत्र से बचे हुए हैं। भारत के अधिसंख्य एमएसएमई के गैर-निगमित ढाँचे और छोटे आकार और लेन-देन की लागत ऊँची होने तथा ऐसे निवेश से एग्जिट में कठिनाई के कारण के कारण वेंचर कैपिटलिस्ट और प्राइवेट ईक्विटी प्लेयर उनमें निवेश करने के लिए अनिच्छुक रहते हैं। किन्तु भारत में वेंचर कैपिटल का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। भारत के एमएसएमई क्षेत्र में वेंचर कैपिटल जैसी फंडिंग का चलन बढ़ रहा है। साथ ही, वेंचर कैपिटल अपनी पहुँच का विस्तार परंपरागत वेंचर कैपिटल क्षेत्रों जैसे सूचना प्रौद्योगिकी से आगे तक कर रहे हैं। आजकल स्वच्छ ऊर्जा, स्वास्थ्य देखभाल, औषधि-निर्माण, खुदरा व्यापार, मीडिया आदि क्षेत्रों में भी रुचि बढ़ रही है।

हाल के वर्षों में सरकार-नियंत्रित वित्तीय संस्थाओं ने एमएसएमई को उचित और वहन करने योग्य लागत पर तथा आम तौर पर आनेवाली कठिनाइयों के बिना निधियों तक पहुँचने के लिए सकारात्मक व प्रगतिशील उपाय आरंभ किए हैं। कम लागत पर निधियाँ लाने, जोखिम शेयर करने और प्रबंधन व प्रौद्योगिकी उन्नयन में इन उद्यमों को सहायता करने के लिए वेंचर कैपिटल फंडिंग संस्थाएं आरंभ की गई है। राष्ट्रीय व राज्य, दोनों स्तरों पर सरकार से निधि-प्राप्त योजनाएं मौजूद हैं। वे अपैक्षाकृत छोटी होती हैं- वे 50 लाख अमेरिकी डॉलर से अधिक की नहीं होतीं।

भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) वेंचर कैपिटल परिचालनों में लगी हुई सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख वित्तीय संस्था है। सिडबी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक संस्था सिडबी वेंचर कैपिटल लिमिटेड (एसवीसीएल) SIDBI Venture Capital Limited (SVCL). के माध्यम से काम करता है। यह राज्य-स्तरीय निधियों का सह-वित्तीयन करता है और कभी-कभी किसी-किसी मामले में प्राइवेट क्षेत्र के वेंचर कैपिटल में सह-निवेश करता है।

2006 से कुछ नए वेंचर कैपिटल एसएमई स्तर पर चल रहे हैं, जैसे हेलियन वेंचर पार्टनर्स, इरैस्मिक वेंचर फंड (ऐक्सेल इंडिया वेंचर फंड), सीड फंड और अपस्ट्रीम वेंचर्स ( Helion Venture Partners, Erasmic Venture Fund (Accel India Venture Fund), SeedFund, and Upstream Ventures.) हालांकि निवेश के लिए प्रौद्योगिकी क्षेत्र की माँग सबसे अधिक है, किन्तु इन्टरनेट कंपनियों से अन्य प्रकार के परिचालनों की और- विशेषकर आईसीटी सक्षम सेवाओं और बायोटेक्नोलॉजी की और रुझान बढ़ा है। कुछ वेंचर कैपिटल शुरुआती चरण में भी चल रहे हैं, जैसे इरैस्मिक वेंचर फंड, सीड फंड, इन्फिटी वेंचर, आईएफआई प्रायोजित सुविधाएँ जैसे स्विस टेक वीसीएफ और सरकार की योजनाएं जैसे सिडबी वेंचर कैपिटल और गुजरात वेंचर कैपिटल।

शुरुआती चरण के वेंचर कैपिटल में सौदे का आकार छोटा और खास तौर से 10 से 30 लाख डॉलर की रेज में रहता है। किन्तु वे 5 लाख डॉलर के निशान से नीचे बहुत कम ही जाते हैं, जहाँ वित्तीय की माँग बहुत अधिक है किन्तु अवसर बहुत कम। छोटे निवेश के संभावित स्रोत सार्वजनिक क्षेत्र की स्थानीय सुविधाएं, बिजनेस ऐंजल, बिजनेस इन्क्यूबेटर निधियाँ और अपवाद स्वरूप मामलों में बीज वेंचर कैपिटल निधियाँ जैसे आविष्कार इंडिया माइक्रो वेंचर कैपिटल फंड Aavishkaar India Micro Venture Capital Fund (AIMVCF) आदि माइक्रो वेंचर योजनाएं. हैं।

निधीयन के अन्य तरीकों की तुलना में वेंचर कैपिटल के लाभ

वित्तीयन के दूसरे रूपों की तुलना में वेंचर कैपिटल के कई लाभ हैः

  • यह दीर्घकालिक ईक्विटी फाइनेन्स लाता है, जिससे भविष्य के विकास के लिए ठोस पूँजी-आधार मिलता है।
  •  वेंचर कैपिटल एक व्यवसायिक हिस्सेदार है जो जोखिम और फायदे, दोनों में हिस्सेदारी करता है। वेंचर कैपिटलिस्ट को व्यवसायिक सफलता और पूंजीगत लाभ प्राप्त होते हैं।
  • वेंचर कैपिटलिस्ट कंपनी को व्यावहारिक सलाह और सहायता दे पाता है, जो इसी तरह की परिस्थितियों वाली दूसरी कंपनियों से मिले अनुभव पर आधारित होती है।
  • वेंचर कैपिटलिस्ट के पास कई क्षेत्रों के संपर्कों का नेटवर्क होता है जो कंपनी के लिए मुख्य-मुख्य कार्मिकों की भर्ती करने, अंतरराष्ट्रीय बाजार से सूत्र जोड़ने, रणनीतिक भागीदारों को लाने और यदि जरूरत हो तो वित्तीयन के अतिरिक्त राउंड की आवश्यकता होने पर दूसरी वेंचर कैपिटल फर्मों के साथ संपर्क जोड़ने में मूल्यवान साबित हो सकता है।.

 

भारत के वेंचर कैपिटल फंड

भारत में वेंचर कैपिटल फंड निम्नलिखित समूहों में वर्गीकृत किए जा सकते हैं:-
 

  • केन्द्र सरकार के नियंत्रण वाली विकास संस्थाओं द्वारा प्रवर्तित जैसेः

 

और सरकारी वेंचर कैपिटल निधियों के लिए यहाँ क्लिक करें click here.
 

  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा प्रवर्तित जैसेः

भारतीय बैंकों की और अधिक वेंचर कैपिटल निधियों के लिए यहाँ क्लिक करें click here.

 

  • प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों द्वारा प्रवर्तित, जैसे:

 

 

भारत में, सभी पंजीकृत वेंचर कैपिटल निधियों की सूची के लिए यहाँ क्लिक करें, click here

 

वेंचर कैपिटल कैसे प्राप्त करें?

वेंचर कैपिटल निधीयन पाने के लिए जानना होता है- कौन सा वेंचर कैपिटल उचित रहेगा और उस तक कैसे पहुँचें?

वेंचर कैपिटलों की नजर में आने का सबसे अच्छा तरीका है उनको जाननेवालों में से किसी की संस्तुति पाना। यदि आप कर पाएं तो किसी वाणिज्य बैंक से सलाह लें और आपको परिचित कराने को कहें। किन्तु निधीयन की तलाश में निकले ज्यादातर उद्यमी शायद इतने भाग्यशाली न हों। यहीं नेटवर्किंग काम आती है। टाई जैसे संगठन ऐसे नेटवर्किंग अवसर प्रदान करते हैं जिनका उद्यमियों को पूरा लाभ लेना चाहिए।

इन जैसे ऐंजल इन्वेस्टमेंट नेटवर्क की मदद लें:

ऐसे वेंचर कैपिटलिस्ट को चुनना आवश्यक है जिसके साथ अच्छे कामकाजी संबंध रखना संभव हो। आम तौर पर व्यवसाय अपनी कैश-फ्लो भविष्यवाणियों को पूरा नहीं कर पाते और उन्हें अतिरिक्त निधियों की जरूरत होती है, इसलिए यदि अतिरिक्त फाइनेंसिंग राउंडों में निवेश करने की जरूरत हो तो उसके लिए निवेशक की क्षमता भी महत्त्वपूर्ण है।. अंततः वेंचर कैपिटलिस्ट चुनते समय उद्यमी को केवल निवेश की राशि और शर्तों पर विचार नहीं करना चाहिए, बल्कि वेंचर कैपिटलिस्ट कंपनी में जो अतिरिक्त मूल्य ला सकता है उस पर भी विचार करना चाहिए। इन कौशलों में उद्योग की जानकारी, निधि जुटाना, वित्तीयन और रणनीतिक योजना का निर्माण, मुख्य-मुख्य कार्मिकों की भर्ती, विलयन तथा अधिग्रहण और अंतरराष्ट्रीय बाजारों व प्रौद्योगिकी तक पहुँच भी शामिल है।

एक बार जब वेंचर कैपिटलिस्टों की संक्षिप्त सूची बन जाए, तब उद्यमी को उन निवेशकों की पहचान करनी चाहिए जो उसकी निधिक आवश्यकताओं को पूरा कर सके। इस बिन्दु पर उद्यमी को वेंचर कैपिटल फर्म और निवेश प्रबंधक से शुरुआती संपर्क बिन्दु के रूप में संपर्क करना चाहिए।

 

फंडिंग की तलाश में हैं?

  • आप इंडियन इन्वेस्टमेंट नेटवर्क Indian Investment Network, पर जानकारी ले सकते हैं जो स्थानीय उद्यमियों को भारतीय व अंतरराष्ट्रीय ऐंजल इन्वेस्टर्स से जोड़ने का एक ऑनलाइन प्लैटफॉर्म है।
  •  आप इंडियन वेंचर कैपिटल ऐसोसिएशन को भी अपनी जरूरत बता सकते हैं। अपने ब्यौरे देने के लिए http://www.indiavca.org/Guest_Book.aspx पर जाएं।.

अपने व्यवसाय के लिए वेंचर कैपिटल फंड जुटाने के बारे में पंकज सहाय की किताब “Smooth Ride to Venture Capital”, पढ़ें। किताब की विषयवस्तु पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें. Click here

 

वेंचर कैपिटल क्या चाहते हैं?

वेंचर कैपिटलिस्ट ऊंची जोखिम वाले निवेशक होते हैं और इन जोखिमों को स्वीकार करने में उनकी इच्छा रहती है कि अपने निवेश पर उनको ऊँचा प्रतिलाभ मिले।  वेंचर कैपिटलिस्ट केवल ऐसे व्यवसायों में निवेश करके जोखिम/लाभ अनुपात को मैनेज करते हैं जो उनके निवेश मानदंड में फिट होते हैं। वह पर्याप्त सम्यक सावधानी के पश्चात निवेश करते हैं।

वेंचर कैपिटलिस्टों की परिचालन पद्धतियाँ अलग-अलग होती हैं। ये अंतर व्यवसाय के स्थान, निवेश के आकार, कंपनी की स्टेज, उद्योग विशेषज्ञता, निवेश की संरचना और कंपनी की गतिविधियों में वेंटर कैपिटलिस्टों के इन्वॉल्वमेंट से संबंधित हो सकते हैं।

निवेश की जानेवाली भावी कंपनियों वेंचर कैपिटल फर्म उत्पाद अथवा सेवा, बाजार विश्लेषण, कंपनी के परिचालन, अपेक्षित निवेश और उसके उपयोग, वित्तीय अनुमान के बारे में जानकारी माँगेगी और सबसे महत्वपूर्ण यह कि वह प्रबंधन टीम के बारे में सवाल पूछेगी।

ऊपर बताए गए सभी सवालों के जवाब बिजनेस प्लान में होने चाहिए। यदि यह माना जाए कि वेंचर कैपिटलिस्ट निवेश के अवसर में रुचि दर्शाता है, तो अच्छे बिजनेस प्लान का होना एक पूर्वापेक्षा है। बिजनेस प्लान तैयार करने के बारे में और अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें। click here.

स्रोत

  • Business Portal of India
  • Financing Technology Entrepreneurs & SMEs in Developing Countries: Challenges and Opportunities – India Country Study, an infoDev publication
  • India Venture Capital AssociationNeytri.com

इन्क्यूबेटर

1. राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (एनएसआई)प्रशिक्षण व इन्क्यूबेशन केन्द्र

देश में कई जगहों पर एनएसआईसी प्रशिक्षण व इन्क्यूबेशन केन्द्र (एनएसआईसी-टीआईसी) चलाए जा रहे हैं। इनमें पहली पीढ़ी के उद्यमियों को बुनियादी तकनीकी गुण व कौशल सीखने तथा व्यवसायिक परिचालन के सभी क्षेत्रों का परिचय पाने का मौका मिलता है,  जैसे व्यवसाय कौशल विकास, उपयुक्त प्रौद्योगिकी का निर्धारण, कार्यशील परियोजनाओं पर काम करने का अनुभव, परियोजना/ उत्पाद चुनना, अवसरों के बारे में मार्गदर्शन, जिसमें वाणिज्यिक आयाम भी शामिल हैं। एनएसआईसी ने देश में सार्वजनिक-निजी सहभागिता (पीपीपी) के माध्यम से बहुत-से फ्रेंचाइजी एनएसआईसी-टीआईसी स्थापित करने की योजना बनाई है ताकि इस प्रशिक्षण का दायरा बढ़ाया जा सके और अधिक से अधिक संख्या में बेरोजगार लोगों को प्रशिक्षित किया जा सके।

एनएसआईसी के इन्क्यूबेशन केन्द्रों के बारे में और अधिक जानने के लिए http://www.nsic.co.in/incubator.asp  देखें।


2. इन्क्यूबेशन के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग से सहायता: राष्ट्रीय विज्ञान व प्रौद्योगिकी उद्यमिता विकास बोर्ड (एनएसटीईडीबी), वित्रान और प्रौद्योगिकी विभाग

एनएसटीईडीबी ज्ञान-चालित और प्रौद्योगिकी सघन उद्यमों के संवर्द्धन में मदद करनेवाली संस्थागत प्रणाली है। इसकी कई योजनाएं हैं। उन्हीं में से एक अपूर्व प्रयास है प्रौद्योगिकी व्यवसाय इन्क्यूबेटर (टीबीआई)। टीबीआई नए उद्यमों (और साथ ही, क्षेत्र के वर्तमान लघु एवं मध्यम उद्यमों को) कई तरह की सेवाएँ तो देते ही हैं, साथ ही वे उक्त उद्यमों के अस्तित्व में बने रहने और विकास के लिए अनुकूल वातावरण बनाए रखने में भी मदद करते हैं। टीबीआई की अनिवार्य विशेषता यह है कि आश्रित कंपनियाँ 2-3 वर्ष के अंतराल में इन्क्यूबेटर छोड़कर निकल जाती हैं। हर टीबीआई अधिक से अधिक 2-3 क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करता है। जहाँ तक नए टीबीआई की विधिक स्थिति का संबंध है, उनको किसी ऐसे स्वायत्तशासी निकाय के रूप में पंजीकृत कराना होता है, जो सोसायटी अधिनियम 1860 के अंतर्गत सोसायटी और /अथवा धारा 25 के अंतर्गत अलाभकारी कंपनी के रूप में में पंजीकृत हो। हर टीबीआई से अपेक्षित है कि वह परियोजना मंजूरी की तारीख से पाँच वर्ष के भीतर स्वतः सक्षम हो जाए।

जिन क्षेत्रों को विशेष जोर देने के लिए चिह्नित किया गया है उनमें अत्याधुनिक सुविधाएं जुटाने के लिए एनएसटीईडीबी वित्तीय सहायता प्रदान करता है। बार-बार होनेवाले परिचालन संबंधी खर्चों की आंशिक/ पूर्ण पूर्ति के लिए यह पाँच वर्ष की अवधि तक सहायता भी देता है।

एनएसटीईडीबी के इन्क्यूबेशन केन्द्रों के बारे में और अधिक जानने के लिए देखे- http://www.nstedb.com/


3.      सिडबी इनोवेशन व इन्क्यूबेशन सेंटर (एसआईआईसी)

सिडबी इनोवेशन व इन्क्यूबेशन सेंटर (एसआईआईसी) की स्थापना भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर में की गई है। इसका उद्देश्य ज्ञान और प्रौद्योगिकी आधारित क्षेत्रों में खास तौर से लघु उद्यमों के लिए उद्यमिता का पोषण व विकास करना है। 31 मार्च 2008 तक इस सेंटर से चार कंपनियाँ तैयार होकर निकल चुकी हैं, जबकि अधुनातन प्रौद्योगिकियों व सॉफ्टवेयर विकास आदि के विविध क्षेत्रों में सात कंपनियाँ पोषित हो रही हैं। 30 नवंबर 2008 तक इस केन्द्र से आठ इकाइयाँ तैयार होकर निकल चुकी थीं।

एसआईआईसी के बारे में और अधिक जानकारी के लिए देखेः http://www.iitk.ac.in/siic/

पब्लिक लिस्टिंग

Public Listing

अच्छे ट्रैक रिकॉर्ड वाले सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम पब्लिक लिस्टिंग प्रक्रिया के जरिए इनिशियल पब्लिक ऑफर (आईपीओ) के माध्यम से आम जनता से भी निधि जुटा सकते हैं। किन्तु आईपीओ रूट केवल उन कंपनियों के लिए संभव है जिनका पिछला कार्य-निष्पादन बहुत अच्छा है और जिनकी बाजार में खूब प्रतिष्ठा है।

सिक्युरिटीज एंड एक्स्चेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) ने हाल ही में लघु एवं मध्यम उद्यमों (एसएमई) के लिए शेयर-लिस्टिंग मानदंडों में ढील दी है और उनको हर तीन महीने के बजाय हर छह महीने में अपने वित्तीय परिणाम घोषित करने की अनुमति दी है, जैसाकि बड़ी कंपनियों के लिए मानदंड है। एसएमई के लिए सेबी की कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषताएं इस प्रकार हैः

  • एसएमई एक्स्चेंज में सूचीबद्ध कंपनियों के लिए आवश्यक नहीं होगा कि अपने शेयरधारकों को पूरी वार्षिक रिपोर्ट भेजें। साथ ही, उनको अपने वित्तीय परिणाम प्रकाशित करने की जरूरत भी नहीं होगी, जैसाकि मुख्य स्टॉक एक्स्चेंज में होता है। एसएमई एक्स्चेंज में सूचीबद्ध कंपनियाँ अपने शेयरधारकों को एक विवरणी भेज सकते हैं, जिसमें सभी दस्तावेजों की मुख्य-मुख्य बातें दी गई हों।
  • कंपनियों को हर समय जारी किए गए शेयरों की कुल संख्या की कम से कम 25% पब्लिक शेयर धारिता रखनी होगी। दूसरे शब्दों में प्रवर्तकों का स्टेक 75% से अधिक नहीं हो सकता।

एसएमई एक्स्चेंज की लिस्टिंग चाहनेवालों के लिए विहित शर्तों के संबंध में सेबी द्वारा जारी परिपत्र डाउनलोड करने के  लिए यहाँ क्लिक करें  click here

बैंकों से संपर्क कैसे करें?

How to Approach Banks

यदि एमएसएमई उधारकर्ता बैंकों या वित्तीय संस्थाओं से उपयुक्त ढंग से संपर्क स्थापित करते हैं, तो वे अपनी ऋण ज़रूरतें पूरी कर सकते हैं और यथासंभव श्रेष्ठतम शर्तों का लाभ उठा सकते हैं। उन्हें उन विभिन्न मानदंडों को अच्छी तरह और स्पष्ट रूप से समझना चाहिए, जिनके आधार पर बैंक उनकी आवेदन की जाँच करते हैं, श्रेणीनिर्धारण प्रदान करते हैं और उसकी मूल्यांकन प्रक्रिया करते हैं। उन्हें सटीक तथा सही सूचनाएं देने का महत्त्व भी समझना चाहिए। जैसे-जैसे वाणिज्यिक ऋण ब्यूरो (विशेष रूप से क्रिसिल) अपने आँकड़ा-आधार का विस्तार करते जाएगा, वैसे-वैसे वित्तीय संस्थाओं के लिए ऋण आवेदक के पिछली चुकौती /चूक का इतिहास जानना यह अधिक आसान होता जाएगा। 

अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

बैंक आपके विषय में क्या ज़रूरी बातें जानना चाहते हैं ?

What Banks Need To Know About You?

जहाँ तक संभव हो, अपने बैंकर या वित्तीय सलाहकार को पूरी और पारदर्शी जानकारी दें। इससे वे पूरी स्थिति समझ सकेंगे और आपको उपयुक्त सलाह दे सकेंगे। कोई महत्त्वपूर्ण सूचना, जैसे अन्य ऋणदाताओं के प्रति संभवित देयताएँ या यह तथ्य कि आपने पहले ही अपनी आस्तियाँ गिरवी रखी हुई हैं, न देने से बाद में कठिनाइयाँ पैदा होंगी। तब तक आप अपना काफी समय व्यर्थ कर चुके होंगे और शायद बैंक के संव्यवहार के अपने रास्ते भी बंद कर चुके हों। 

सामान्य विवरण

यदि ऋणदाता आपको पहले अच्छी करह से नहीं जानता है, तो यह बेहतर होगा कि अपना और अपनी पृष्ठभूमि से संबंधित जानकारी तैयार रखें। इसमें निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं :

पहचान-पत्र

यदि आपको व्यवसायी समुदाय में अब तक की जानता नहीं है, तो यह उचित होगा कि आप किसी ऐसे व्यक्ति के सौजन्य से अपना परिचय दें, जिसे व्यवसाय से जुड़े व्यक्ति सम्मान देते हों और जो आपको भली-भाँति जानता हो।   एक संक्षिप्त पत्र, जिसमें आपकी उपलब्धियों का विवरण हो, आपके अच्छा चरित्र एवं सत्यनिष्ठा प्रमाणित की गई हो, परिचय का एक परंपरागत तरीका है। यदि संदर्भ देने वाला व्यक्ति व्यवसायी समुदाय में सम्मानित होगा, तो इसका प्रभाव सकारात्मक होगा।

आपका व्यक्तिगत विवरण/प्रोफ़ाइल

यह आपका संक्षिप्त विवरण या व्यक्तिवृत्त है, जिसमें आपकी शैक्षिक उपलब्धियाँ, पेशागत प्रशिक्षण, योग्यताएँ, रोज़गार संबंधी विवरण और उपलब्धियाँ शामिल होते हैं। यह एक या दो पृष्ठ से अधिक लंबा नहीं होना चाहिए। आपके उक्त विवरण से आपके बैंक को व्यापार करने, निर्यात के लिए सामानों का उत्पादन करने और सेवाएं देने तथा व्यक्तियों के प्रबंध के बारे में आपकी क्षमता का मूल्यांकन करने में मदद मिलेगी।  

यदि पूर्व नियोक्ताओं के प्रमाणपत्र एवं संदर्भ हों, और आपको लगता हो कि वे प्रासंगिक हैं, तो उन्हें संलग्न करें। उनसे आपके अनुभव और क्षमताएँ दर्शाने में मदद मिलेगी, विशेष रूप से यदि नियोक्ता ज्ञात और सम्मानित है और उसने आपके विषय में सकारात्मक टिप्पणियाँ दी हैं।  

आपके व्यवसाय की विवरणिका (ब्रोशर)

अपनी कंपनी की विवरणिका देने से न झिझकें। उसमें आपके व्यवसाय के स्वरूप, उत्पादों तथा आप कब से इस व्यापार में हैं, इसके बारे में जानकारी होनी चाहिए। ग्राहकों की सूची देना उचित होगा। यदि सूची गोपनीय है, तो बैंकर को उसे देते समय यह बात स्पष्ट रूप से बताएँ। यदि आप भागीदारी में हैं या आपकी कंपनी में निदेशक हैं, तो वे कौन हैं, यह जानकारी दें और उनमें से प्रत्येक के बारे में संक्षिप्त विवरण भी दें, विशेष रूप से यदि व्यवसायी समुदाय में अच्छी प्रतिष्ठा है।

बैंक और अन्य संदर्भ Bank and Other References

यदि संस्था आपका वर्तमान बैंकर नहीं है, तो अपने बैंक का संदर्भ दें, ताकि संस्था आपके बारे में विवरणों, विशेष रूप से भुगतानों की नियमितता, पिछले ऋण का रिकॉर्ड और सामान्य प्रतिष्ठा  की जाँच कर सके। आपके लेखाकार एवं अधिवक्ता के नाम बताना भी मददगार होगा। 

कंपनी के स्वामित्व या पंजीकरण का प्रमाण

कुछ देशों में यह प्रमाण आवश्यक होता है कि जिस कंपनी के नाम में आप ऋण लेना चाहते हैं, वह आपकी है और विधिवत् पंजीकृत है। लेखापरीक्षित या अनुमोदित लेखों के अभाव में आपको आस्तियों एवं देयताओं की शपथयुक्त सूची देनी पड़ सकती है। पहले से यह जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करें कि क्या कोई ऐसे पात्रता मानदंड हैं, जिनके लिए आपको दस्तावेज़ या विवरणियाँ प्रस्तुत करने की आवश्यकता हो, विशेष रूप से तब, जब आप निर्यातकों के लिए विशेष सुविधाएँ उपलब्ध कराने वाली सरकारी या राजकीय संस्थाओं से संपर्क कर रहे हों। 

वित्तीय स्थिति

कोई भी ऋणदाता आपके व्यवसाय की अद्यतन वित्तीय सूचनाओं की अपेक्षा करेगा। जो मानक वित्तीय रिपोर्टें आपको तैयार रखनी चाहिए, वे हैं :

तुलनपत्र, लाभ एवं हानि लेखा, तथा नक़दी प्रवाह विवरण

इनकी लेखापरीक्षा सनदी लेखाकारों की किसी फ़र्म से कराई जानी चाहिए, या उन्हें स्वतंत्र लेखाकार से प्रमाणित कराया जाना चाहिए और ये आपके निदेशक मंडल से अनुमोदित होने चाहिए। अन्यथा आपको इस आशय का प्रमाण प्रस्तुत करना होगा कि आपके लेखे आपकी वित्तीय स्थिति को सही-सही और स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। आपके तुलनपत्र का आकार और आपके व्यवसाय में ईक्विटी का राशि महत्त्वपूर्ण हैं, किंतु वे अल्पावधि ऋण मंजूर करने के आपके बैंकर के निर्णय को निर्धारित करने वाले कारक नहीं हैं। आपका बैंकर उन संव्यवहारों के बारे में ज्यादा चिंतित होगा, जो संबंधित सुविधा के अधीन किए जाएँगे। यदि आपके लेखापरीक्षित लेखे पुराने, जैसे - तीन माह से अधिक पुराने (अर्थात् लेखों की बंदी की तिथि तीन माह या उससे अधिक पुरानी है), तो आप अपना हाल का परिचालन विवरण एवं नक़दी प्रवाह विवरण अपने साथ तैयार रखें।

चालू या आगामी वर्ष के लिए बज़ट

इस दस्तावेज़ में चालू वर्ष या आगामी वर्ष के लिए आपकी प्रानुमानित बिक्री और राजस्व के आँकड़े और साथ ही साथ परिचालन लागत एवं ऊपरी खर्चों के आँकड़े परिलक्षित होने चाहिए। यदि कोई योजनाबद्ध पूँजी व्यय है, तो आप उसके बारे में अलग से दस्तावेज़ तैयार रखें।  आपके बज़टाधीन (या अनुमानित) राजस्व का विवरण पर्याप्त रूप से विस्तार से दिया जाना चाहिए, ताकि वह विश्वसनीय हो सके। दूसरे शब्दों में, आँकड़े केवल इच्छा-कल्पित सोच के परिणाम नहीं होने चाहिए, बल्कि पक्के और अनंतिम आदेशों पर आधारित होने चाहिए और आप उसमें पिछले कार्यनिष्पादन के आधार पर प्रत्याशित आदेश जोड़ सकते हैं।

बुक किए गए आदेशों का वाणिज्यिक सूचना संबंधी विवरण

यदि आप किसी बड़ी या लाभप्रद नई संविदा को पूरा करने के लिए ऋण का अनुरोध कर रहे हैं, तो सभी दस्तावेज़, पत्राचार, आपूर्तिकर्ता से प्राप्त दर-सूचियाँ(कोटेशन), क्रेता एवं आपूर्तिकर्ता के साथ संविदा के प्रारूप, तथा आपका अपना लागत निर्धारण विवरण व परिकलन विचार-विमर्श के लिए तैयार रखें। यह तब और अधिक महत्त्वपूर्ण है, जब आपका आदेश निर्यात के लिए हो। आप अपने बैंक से जो ऋण सुविधा प्राप्त करेंगे, उसे निश्चित रूप से उन भुगतान विधियों के अनुरूप व्यवस्थित किए जाने की आवश्यकता होगी, जो आप अपने आपूर्तिकर्ताओं के साथ उपयोग करेंगे या जिन्हें आपके विदेशी क्रेता ने निर्धारित किया होगा। जब तक आप अपने बैंक के साथ ऋण एवं भुगतान विधियों के बारे में चर्चा नहीं कर लेते हैं, तब तक आपूर्तिकर्ताओं या ग्राहकों के साथ अंतिम रूप से संविदा पर हस्ताक्षर न करें। इसका कारण बिल्कुल स्पष्ट है। अधिकतर निर्यात-आयात संबंधी व्यवसाय करार या संविदाओं में भुगतान का स्वरूप और उधार (विलंबित भुगतान) की वे शर्तें नियत होती हैं, जो क्रेता या विक्रेता प्रस्तावित करते हैं या जिनकी अपेक्षा करते हैं। संविदा पर हस्ताक्षर हो जाने के बाद, शर्तों में परिवर्तन करना संभव नहीं होगा और इससे उन सुविधाओं के दायरे सीमित हो जाते हैं, जो बैंकर आपको देने में समर्थ हो सकता है।  

व्यवसाय योजना

आपकी कंपनी की अद्यतन व्यवसाय योजना, जिसमें आगामी तीन से पाँच वर्षों के लिए अभिप्रेत पूँजी निवेश और पूर्वानुमानित राजस्व एवं व्यय दर्शाया गया हो, बैंकर या वित्तीय सलाहकार के साथ चर्चा के दौरान प्रस्तुत किया जाने वाले एक उत्कृष्ट एवं महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ होता है।  यदि आपके पास ऐसी योजना नहीं है, तो उसे बना लेना उपयोगी होगा। यह आपके लिए व्यक्तिगत रूप से अतीव मूल्यवान होगा और जब आप अपने ऋणदाता से ऋण अनुरोध के बारे में विचार-विमर्श करेंगे, तो इससे आपकी विश्वसनीयता में वृद्धि होगी।

व्यवहार्यता अध्ययन

व्यवहार्यता अध्ययन सामान्यत: मध्यम अवधि या दीर्घावधि परियोजनाओं के संबंध में किए जाते हैं और अन्य कारणों के साथ-साथ, मध्यम अवधि से दीर्घावधि परियोजनाओं के ऋण का वित्तीयन जुटाने के लिए साधन के रूप में तैयार किए जाते हैं।  आप नई परियोजना शुरू करना चाहते होंगे या मौजूदा गतिविधि का विस्तार करना चाहते होंगे, और अपेक्षित अतिरिक्त पूँजीगत सामानों (जैसे – मशीनें, औज़ारीकरण, अतिरिक्त पुर्ज़ें और कच्चा माल) के वित्तीयन के लिए पूँजी चाहते होंगे। इसके लिए आपको अपने बैंकर को प्रस्तुत करने के लिए एक व्यवहार्यता अध्ययन आवश्यक होगा।  आपको उन प्रारूप ऋण करार या वास्तविक ऋण करार की प्रतियाँ भी देनी होंगी, जो अन्य ऋणदात्री संस्थाओं के साथ किए गए हैं। ये महत्त्वपूर्म हैं, क्योंकि ऋम करार में यह शर्त शामिल हो सकती है कि आप तब तक किसी अन्य ऋणदाता से उधार नहीं ले सकते हैं, जब तक कि वह गौण ऋम न हो।  इसका तात्पर्य यह है कि यदि स्थिर या चालू आस्तियों पर प्रथम ऋणदाता का स्थिर या चल प्रभार है, तो आप वे स्थिर या चालू आस्तियाँ गिरवी नहीं रख सकते हैं। ऐसी स्थिति में आप अपने बैंक को केवल द्वितीय प्रभार या कोई अन्य कम सुरक्षित स्वरूप की गारंटी ही दे सकेंगे। कई मायनों में, व्यवहार्यता अध्ययन व्यवसाय योजना के प्रस्तुतीकरण से भिन्न नहीं होता है। मुख्य अंतर उसके प्रयोजन में होता है।

आप जो गारंटी या संपार्श्विक प्रतिभूति दे सकते हैं

बहुत कम ऋणदाता आपको प्रतिभूति के बिना ऋण मंजूर करेंगे। आप क्या गारंटी या संपार्श्विक प्रतिभूति दे सकते हैं?


प्रतिभूति और संपार्श्विक पदों के अर्थ समान हैं

गारंटी वह है, जिसे आप आस्तियों को गिरवी रख कर ऋणदाताओं को देते हैं, और यदि आप ऋण चुकाने में चूक करते हैं, तो उस पर वे कब्ज़ा कर उसे बेच सकते हैं। गारंटी का एक दूसरा रूप ऋणदाता के पक्ष में बीमा पॉलिसी होता है या किसी तृतीय पक्ष की ओर से ऋण चुकाने का वचनपत्र होता है, यदि आप ऋण चुकाने में चूक करते हैं।  आप एक बैंक से ऋण लेने के लिए दूसरे बैंक से भी गारंटी प्राप्त कर सकते हैं। यदि आप विदेश में किसी बैंक से ऋण लेते हैं, तो यह एक मौजूदा परंपरा है। विदेशी बैंक को कोई स्थानीय बैंक गारंटी देता है, जो विदेशी बैंक की तुलना में आपकी आस्तियों पर अधिक सरलता से प्रभार ले सकता है। प्रतिभूति का सबसे आम रूप स्थिर आस्तियों, विशेष रूप से भूमि एवं संपत्ति पर प्रभार (गिरवी) है। अधिकतर ऋणदाता यह अनुभव करते हैं कि भले ही उन्हें बाज़ार मूल्य से कम पर बेचा जाए, किंतु भूमि एवं संपत्तियों का क्रय-विक्रय आसानी से किया जा सकता है। फिर, भूमि एवं संपत्तियों का स्वत्व-विलेख के रूप में प्रामाणिक दस्तावेज़ उपलब्ध होता है और अनेक देशों में ये स्वत्व-विलेख प्राधिकारियों के पास पंजीकृत होते हैं और उन पर किसी प्रकार का भार भी अंकित होगा। (जब कोई आस्ति भारित होती है, तो अन्य पक्ष उस पर वैध दावा रखता है)। जब कोई आस्ति ऋणदाता को गिरवी रखी जाती है, तो उस पर भार हो जाता है और उसे किसी अन्य पक्ष को दुबारा गिरवी नहीं रखा जा सकता है, जब तक कि दोनों पक्ष प्रतिभूति का साझा करने के लिए तैयार नहीं होते हैं।   


अन्य स्थिर आस्तियाँ भी प्रतिभूति हो सकती हैं

मशीने, उपकरण, आदि। अक्सर ऋणदाता के लिए इन्हें प्रतिभूति मानना अव्यावहारिक होता है, क्योंकि उनका बाज़ार मूल्य निर्धारित करना बहुत कठिन होता है, विशेष रूप से तब जब वे नई न हों। कभी-कभी निवेश स्वीकार्य होते हैं, विशेष रूप से तब, जब उनकी वसूली (बिक्री) आसानी से की जा सकती हो। ऐसे निवेश शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध कंपनियों के शेयर प्रमाणपत्र, बांड, डिबेन्चर, ट्रेज़री बिल, आदि के रूप में प्रमाणित रहते हैं। आप चालू आस्तियाँ, कच्चे माल का भांडार, परिष्कृत माल, निर्यात वस्तुएँ, और यहाँ तक कि प्राप्यराशियाँ भी गिरवी रख सकते हैं। गिरवी की सरलतम आस्ति नक़दी होती है। इसे नक़द संपार्श्विक प्रतिभूति कहते हैं। आपका ऋण नक़द रकम से सुरक्षित है! उधारकर्ता इस प्रकार की प्रतिभूति के लिए तब तत्पर होते हैं, जब उनके पास अन्य बैंक में चलनिधि मौजूद होती है, जिसे वे नहीं छूना चाहते हैं। (यह किसी अन्य मुद्रा में हो सकती है, किसी निवेश में लगी हो सकती है, तृतीय पक्ष के स्वामित्व वाली मौजूद निधियाँ हो सकती हैं, या उधारकर्ता के स्वामित्व वाली निधियाँ हो सकती हैं, किंतु उसके व्यवसाय का हिस्सा नहीं होंगी।) आप जिन आस्तियों को ऋण की प्रतिभूति के रूप में गिरवी रखने के लिए तैयार हैं, उनकी सूची तैयार रखें।  भूमि या अन्य संपत्ति के स्वत्व की प्रतियाँ बैंक को दिखाने के लिए लेकर आएँ। 



वित्तीय संस्थाएँ ली गई प्रतिभूतियों के पूरे मूल्य के बराबर कभी-कभार ही ऋण देती हैं

इसका कारण स्पष्ट है : यदि वे ऋण की चुकौती में चूक होने पर प्रतिभूति बेचती हैं, तो यह संभावित होता है कि उन्हें ऋण राशि से कम राशि प्राप्त हो। ऋणों की सुरक्षा के प्रति आवश्यक राशि एक देश से दूसरे देश में और एक आस्ति से दूसरी आस्ति के लिए अलग-अलग हो सकती है। कुछ मामलों में, आपको ऋण राशि से दो या अधिक गुना मूल्य की आस्तियाँ गिरवी रखनी पड़ सकती हैं। 

स्रोत: इंटरनेशनल ट्रेड सेन्टर (जेनेवा) और सिडबी के संयुक्त प्रकाशन – ‘’हाउ टू एप्रोच बैंक्स इन इंडिया’’ 2002 का उद्धरण

 

बैंक के उधार मानदंड

Bank's Lending Criteria

अल्पावधि ऋण के लिए कोई मानक मानदंड नहीं है। बैंक और अन्य ऋणदाता अपने-अपने आंतरिक नियम बनाते हैं। तथापि, सभी वित्तीय संस्थाएँ अपने-अपने राष्ट्रीय वित्तीय प्राधिकारियों (उदाहरण के लिए, केंद्रीय बैंक) द्वारा स्थापित सामान्य विनियमों एवं दिशानिर्देशों से बंधी होती हैं। अनेक देशों में सामान्यत: प्रति ग्राहक एक उधार सीमा होती है, जो संस्था की शेयरधारक निधियों के 25% पर निर्धारित होती है। साथ ही, प्राय:, एक सामान्य नियम के अनुसार, ऋणदाता अपने ऋण संविभाग (ग्राहकों से प्राप्त  जमाराशियों और उधार ली गई राशियों) के कतिपय प्रतिशत से अधिक ऋम नहीं देते हैं। यह प्रतिशत अक्सर लगभग 75% होता है। कभी-कभी बैंक उधारकर्ताओं को सुविधा उपलब्ध न दिए जाने के बहाने के रूप में अपने उधार मानदंड या सांविधिक विनियमों का हवाला देते हैं।     

इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता है और किसी भी तरह, अनिच्छुक ऋणदाता से उधार लेना बुद्धिमत्ता नहीं होगा।

यदि आप निम्नलिखित उधार मानदंड पूरे कर सकते हैं, तो आपका अल्पावधि ऋण का अनुरोध सफल होने के ज्यादा अवसर होंगे :

अच्छा नक़दी प्रवाह

उधारकर्ता के रूप में, आपको यह अनिवार्यत: प्रदर्शित करना चाहिए कि आपका कार्यनिष्पादन सकारात्मक है और यह भी कि परिचालन न केवल लाभप्रद हैं, बल्कि उससे सभी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नक़दी भी प्राप्त होती है।

 पर्याप्त शेयरधारक निधियाँ

दूसरे शब्दों में, अन्य ऋणदाताओं के प्रति पहले से आपकी अत्यधिक प्रतिबद्धता नहीं होनी चाहिए, बल्कि आपके व्यवसाय में आपकी पूँजी का तर्कसंगत अनुपात होना चाहिए।

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पर्याप्त प्रतिभूति

यदि आपकी सभी आस्तियाँ दूसरे ऋणदाताओं के पास पहले से गिरवी रखी हैं, तो बैंक से आपको ऋण नहीं मिलेगा।

व्यापार का अनुभव

अधिकतर संस्थाएँ आपके सफल व्यापार की अच्छी पृष्ठभूमि के बारे में जानना चाहती हैं।  यदि आप पूरी तरह से नए हैं, या किसी नए उत्पाद के साथ, किन्हीं ऐसे देशों के अपरिचित ग्राहकों या आपूर्तिकर्ताओं के साथ, जिनसे पहले आपने कोई संव्यवहार नहीं किया है, कोई बिल्कुल नई व्यापार गतिविधि शुरू कर रहे हैं, तो किसी भी बैंकर को उधार देने के लिए राजी करना कठिन होता है।

अच्छी प्रतिष्ठा

आपके द्वारा दिए गए संदर्भ और परिचय संबंधी विवरण ऋणदाता को स्वीकार्य होने चाहिए। किसी दिवालिया कंपनी या ज्ञात धोकेबाज़ को अग्रिम के अनुमोदन लिए अपनी ऋण समिति या निदेशक मंडल को राजी करना उनके लिए निस्संदेह कठिन होगा। किंतु, यदि यह मान भी लिया जाए कि आपकी पृष्ठभूमि/अतीत बेदाग़ है, तो भी किसी प्रतिष्ठित प्रायोजक का समर्थन होना आपके लिए सहायक होगा। वह व्यापारी-वर्ग, व्यापार संघ या यहाँ तक की आपका ग्राहक या आपूर्तिकर्ता में से कोई सुप्रसिद्ध व्यक्ति हो सकता है।

विशेष प्रयोजन

यद्यपि कुछ ऋणदाता आपकी प्रस्तावित प्रतिभूति के आधार पर अधिविकर्ष (ओवरड्राफ़्ट) की सुविधा प्रदान करते हैं, किंतु अधिकतर संस्थाएँ अपने ऋण को विशिष्ट संव्यवहारों से संबद्ध रखने को प्राथमिकता देती हैं। संव्यवहारों के बारे में पूरा विवरण देते हुए जानकारी दी जानी चाहिए और प्रदर्शित किया जाना चाहिए कि वे लाभप्रद और स्वयं  परिसमापनशील हैं (उधार ली गई राशि की चुकौती वित्तपोषित किए जाने वाले संव्यवहारों के प्रतिफल से की जाएगी)।

स्रोत: इंटरनेशनल ट्रेड सेन्टर (जेनेवा) और सिडबी के संयुक्त प्रकाशन – ‘’हाउ टू एप्रोच बैंक्स इन इंडिया’’ 2002 का उद्धरण

नए उद्यम का वित्तपोषण

Fund Your Startup

A start-up enterprise needs funds to set up and commence business operations. There are several ways of raising capital for the new enterprise including personal savings, issue of shares, raising loans from financial institutions, commercial banks, seeking venture capital investment, etc.

 

To know more on methods of raising capital, click here.

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To find out schemes and policies of various banks and financial institutions, click here

श्रेणीनिर्धारण मापदंड

Rating Parameters

ऋणदाता (बैंक, उद्यम पूँजीपति, आदि) विभिन्न मापदंडों के आधार पर आपकी व्यवसाय संबंधी जानकारियों का विश्लेषण कर आपकी ऋण-सुपात्रता का सावधानीपूर्वक निर्धारण करते हैं। व्यावसायिक संस्थाओं का श्रेणीनिर्धारण करने के लिए सामान्यत: प्रयोग किए जाने वाले मुख्य मापदंड निम्नवत् हैं:

प्रबंधतंत्र

कुछ मुख्य मापदंड, जिन पर विचार किया जाता है, निम्नवत् हैं:

  • पृष्ठभूमि
  • उद्योग संबंधी अनुभव और ज्ञान
  • बैंको के साथ उधारकर्ता का पिछला संव्यवहार
  • अर्हताएँ
  • प्रवर्तकों की संयुक्त निवल संपत्ति
  • सहयोगी प्रतिष्ठान

वित्तीय विवरण

कुछ मुख्य मापदंड, जिन पर विचार किया जाता है, निम्नवत् हैं:

  • चालू अनुपात
  • ऋण ईक्विटी अनुपात
  • औसत कुल बिक्री
  • निवल लाभ
  • आय में संवृद्धि
  • निवल नक़द उपचय
  • प्रस्तावित सहायता के लिए प्रतिभूति संबंधी प्रावधान

परिचालन

कुछ मुख्य मापदंड, जिन पर विचार किया जाता है, निम्नवत् हैं:

  • शाखा कार्यालय से दूरी
  • इकाई का स्थान
  • उधारकर्ता की बाज़ार से दूरी
  • प्रौद्योगिकी का स्वरूप
  • उपकरण आपूर्तिकर्ता
  • गुणवत्ता प्रमाणपत्र

उद्योग

कुछ मुख्य मापदंड, जिन पर विचार किया जाता है, निम्नवत् हैं:

  • उद्यम की प्रकृति- चक्रीय/मौसमी
  • सहायता योजना के तहत पात्रता, यदि कोई हो
  • प्रतिस्पर्धी बढ़त
  • उत्पादों का ब्रॉड होना
  • उत्पाद/ मशीनों के अनुप्रयोगों की संख्या

पिछले ऋण संबंधी निष्पादन

कुछ मुख्य मापदंड, जिन पर विचार किया जाता है, निम्नवत् हैं:

  • चुकौती इतिवृत्त
  • चूकगत किस्तें
  • ब्याजदर/ अवधि में पुनरीक्षण
  • समय-पूर्व भुगतान
  • चूक
    • चूक का माह
    • चूक की राशि
    • चूक का कारण, यदि दिया गया है
    • प्रतिभूति का पुनर्बिक्री मूल्य
    • बैंक को होने वाली पूँजीगत हानि

अपना अनुरोध प्रस्तुत करना

Presenting Your Request

आप किसी बैंक या ऋणदात्री संस्था से किस प्रकार संपर्क करते हैं, यह सर्वाधिक महत्त्पूर्ण है। यहाँ कुछ युक्तियाँ दी जा रही हैं। इनमें से अधिकतर सामान्य ज्ञान पर आधारित उपाय हैं और आपको सदैव विनम्रता /शिष्टाचार एवं खुलेपन के मूल सिद्धांत का पालन करना चाहिए।

यह जानें कि आप किसके साथ संव्यवहार कर रहे हैं।

यदि आप पहले से संस्था के ग्राहक नहीं हैं और उसे अच्छी तरह से नहीं जानते हैं, तो संस्था के बारे में जो कुछ भी जानकारी आप प्राप्त कर सकते हैं, उसे अग्रिम रूप से प्राप्त करें। अपने व्यापार संघ, चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स, या स्थानीय उद्योग परिसंघ से उसके बारे में सलाह प्राप्त करें। संस्था की वार्षिक रिपोर्ट की प्रति प्राप्त करने का प्रयास करें और उसकी संबद्धता, शेयरधारकों एवं निदेशकों के बारे में समीक्षा करें। बैंकों और अन्य संस्थाओं में विवरणिकाएँ (ब्रोशर) और वार्षिक रिपोर्टें बे-रोकटोक उपलब्ध रहती हैं। इनसे उनकी संरचना, संगठन और सेवाओं के बारे में काफी जानकारी मिलती है। बैंक अपनी उधार दरें भी इंगित करते हैं और अपने सेवा-प्रभार एवं शुल्क संबंधी सारणी भी देते हैं।

अपने आशय के बारे में पहले ही सूचना दें

पहले से ही मुलाक़ात के लिए कॉल कर समय लें या पत्र लिखें यौ फ़ैक्स भेजें, जिसमें अपने बारे में और अपने पेशे के बारे में संक्षिप्त जानकारी दें तथा यह भी इंगित करें कि आप कितना ऋण लेना चाहते हैं और क्यों। यद्यपि आप अपना संव्यवहार पत्राचार के माध्यम से भी कर सकते हैं, किंतु यह सामान्यत: बेहतर होगा कि आप अल्पावधि वाणिज्यिक उधार या व्यापार वित्त के प्रभारी व्यक्ति से मुलाक़ात करें। यदि संस्था काफी दूर है, तो जाहिर है यह संभव नहीं होग, ऐसी स्थिति में आप इस बात के लिए विशेष रूप से सावधानी रखें कि आप अपना परिचय कैसे करवाते हैं और आप क्या जानकारी उपलब्ध कराते हैं।

अच्छी तरह से तैयारी करें

आपका बैंकर एक व्यस्त व्यक्ति है और उसे आपके अनुरोध का स्वरूप तेज़ी से समझनी होती है : इसले आप शीघ्रता से अपने मुख्य विषय पर आएँ। यह बताएँ कि आप कौन हैं, आपका व्यवसाय क्या है, आप कितनी राशि चाहते हैं और किस प्रयोजन से वह राशि चाहते हैं। अपनी वार्षिक रिपोर्ट (यदि आप प्रकाशित करते हैं) या वित्तीय विवरण (तुलनपत्र, लाभ-हानि लेखा, बज़ट, व्यवसाय योजना) और साथ ही अपनी कंपनी की विवरणिका (ब्रोशर) उपलब्ध कराने के लिए तैयार रखें। यह स्पष्ट रूप से बताएँ कि आप उधार ली जाने वाली निधियों का क्या करना चाहते हैं। यदि आप वित्त का उपयोग सामान या निर्यात के लिए उत्पाद विनिर्माण हेतु आवश्यक सामग्री (या निर्यात के लिए उत्पादकों से उपयोग-योग्य माल) खरीदने के लिए करना चाहते हैं, तो अपने बैंकर को पूरी जानकरी /विवरण बताएँ – जैसे – आप किससे खरीद रहे हैं, आप किसे बेच रहे हैं, आप कैसे भुगतान करेंगे या भुगतान प्राप्त करेंगे। अपने आपूर्तिकर्ताओं और ग्राहकों के साथ संविदा या करार पर हस्ताक्षर करने या भुगतान व्यवस्था करने से पहले इन सभी मामलों के बारे में अपने बैंक को बताएँ।

सलाह लें

अनुभवी बैंकर विभिन्न भुगतान विधियों के जोखिम, संव्यवहारों के लिए वित्तीयन के उचित माध्यम तथा आपके ऋण के प्रति गारंटी के रूप में उपलब्ध कराई जोने वाली प्रतिभूतियों के बारे में आपका मार्गदर्शन कर सकते हैं और आपको सलाह दे सकते हैं। मुद्रा एवं मूल्य के उचार-चढ़ाव के जोखिम के लिए या उन्हें कम करने के लिए प्रतिरक्षा/बचाव व्यवस्था की संभावनाओं के बारे में पूछना न भूलें।    

सतर्क रहें

अत्यधिक लंबी अवधि या अत्यधिक ऊँची ब्याजदर पर अपनी आवश्यकता से अधिक ऋण लेने से बचें। कभी-कभी बैंक उस प्रकार के ऋणों या भुगतान विधियों का प्रस्ताव करते हैं, जिनसे वे परिचित होते हैं, जो अधिक लाभकारी होते हैं या जो सबसं कम जोखिम वाले होते हैं। लागत के बारे में पूछें।  यह याद रखें कि ब्याजदर के अलावा भी अन्य लागतें, शुल्क एवं प्रभार होते हैं। अग्रशुल्क क्या है? (ये वे भुगतान हैं, जो बैंक/ऋणदाता आपके अनुरोध का मूल्यांकन करने, जोखिम का निर्धारण करने या खाता खोलने की अपनी लागत के रूप में ऋण के पहले संवितरण में से काट लेता है)। संसाधक कार्यालय(बैक-ऑफ़िस) शुल्क क्या है? जो प्रत्येक संवितरण पर लगाया जाता है। यदि विदेशीमुद्रा खरीदने या कोई दस्तावेज़ी साख खोलने के लिए बैंक अग्रिम का उपयोग करता है, तो उसकी लागत क्या होगी?

अधिकतर संस्थाओं में उनकी सेवाओं के लिए मानक या परिवर्तनीय (स्लाइडिंग) दरें होती हैं। उसकी एक प्रति माँगने से न झिझकें। साथ ही यह मार्गदर्शन भी प्राप्त करें कि वे दरें आपके संव्यवहारों को कैसे प्रभावित करेंगी। यदि कोई विधिक लागत हो,, जैसे ऋण संविदा के प्रारूपण या किसी आस्ति या डिबेन्चर पर भार का पंजीकरण कराने के लिए अधिवक्ता का शुल्क, तो अपनी प्रतिबद्धता देने से पहले उनके बारे में स्पष्टीकरण प्राप्त करें।   

अन्य बैंकों में पूछताछ करने से बचें

सर्वोत्तम सौदे के चक्कर में अनेक बैंकों /ऋणदाताओं से बार-बार पूछताछ, अनेक संस्थाओं के दौरे और तुलना करने से बचें, क्योंकि बैंकर आपके इस बर्ताव को पसंद नहीं करेंगे। यदि बैंकर ने आपके साथ घंटों व्यतीय के हों, दस्तावेज़ीकरण तैयार किए हों और अपनी ऋम समितियों, वरिष्ठ प्रबंधतंत्र या निदेशक मंडल से ऋण के लिए अनुमति प्राप्त कर ली हो और उसके बाद आप यह कहते हैं कि आपको अन्य कहीं बेहतर सौदा मिल गया है, तो आप उनका समय व्यर्थ कर दिया है। वस्तुत: बैंकिंग क्षेत्र की जानकारी प्राप्त करने और सर्वोत्तम सौदा करने में कोई गलत बात नहीं है, किंतु बातचीत के उस स्तर तक पहुँच जाने के बाद, जहाँ यथार्थ रूप में करार को अंतिम रूप दिया जा चुका हो और प्रबंधतंत्र या निदेशक मंडल का अनुमोदन प्रतीक्षित हो, तब आप यह दर्शाने का प्रयास न करें कि आप अन्य संस्थाओं से भी बातचीत कर रहे हैं। उधारकर्ता और ऋणदाता के बीच अच्छे संबंध की सफलता मुख्यत: विश्वास पर टिकी होती है। विश्वास समय के साथ बढ़ता है और यह सकारात्मक अनुभव पर आधारित होता है। कोई भी बैंकर अक्सर अत्यंत अल्पावधि के छोटे और भली-भाँति प्रतिभूत ऋण देकर संभावित ग्राहक का परीक्षण करने का प्रयास करता है कि देखें यह कितना सफल होता है। जैस-जैसे संव्यवहार सफलतापूर्वक दोहराए जाते हैं, ग्राहक की प्रतिष्ठा बढ़ती जाती है और उसका ऋण बढ़ता है। जब आप किसी संस्था से पहली बार संपर्क करते हैं, तो इसे ध्यान में रखें। सबसे सस्ता ऋणदाता दीर्घावधि में सबसे अच्छा सिद्ध नहीं हो सकता है।

स्रोत: - इंटरनेशनल ट्रेड सेन्टर (जेनेवा) और सिडबी का संयुक्त प्रकाशन, 2002 - हाउ टु एप्रोच बैंक्स इन इंडिया? से उद्धरण

ऋण गारंटी निधि योजना

Credit Guarantee Fund Scheme

अत्यंत लघु एवं लघु उद्यम, विशेष रूप से प्रथम पीढ़ी के उद्यमी ऋणों के लिए संपार्श्विक प्रतिभूति देने में असमर्थ होने के कारण, बैंक से ऋण प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए, सरकार ने 30 अगस्त, 2000 को लघु उद्योगों के लिए ऋण गारंटी निधि योजना शुरू की, ताकि संपार्श्विक प्रतिभूति की समस्या और अत्यंत लघु एवं लघु उद्योग क्षेत्र को ऋण उपलब्ध होने में आने वाली बाधाओं का निदान किया जा सके।  

सरकार ने लघु उद्योग इकाइयों, विशेष रूप से अतिलघु इकाइयों को संपार्श्विक प्रतिभूति /तृतीय पक्ष की गारंटी के बिना 10 लाख रुपये (वर्तमान में यह 100 लाख रुपये तक के ऋणों के लिए लागू है) तक के ऋण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से, 19 मई, 2000 को लघु उद्योग ऋण गारंटी निधि योजना के लिए अनुमोदन प्रदान किया।


सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम ऋण गारंटी निधि योजना के क्रियान्वयन के लिए, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय और भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम ऋण गारंटी निधि ट्रस्ट (सीजीटीएमएसई) नामक ट्रस्ट की स्थापना की। यह योजना औपचारिक रूप से 30 अगस्त, 2000 को शुरू की गई और 01 जनवरी, 2001 से इस योजना का परिचालन शुरू हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य यह है ऋणदाता परियोजना की सक्षमता को महत्त्व दें और केवल वित्तपोषित आस्तियों की प्राथमिक प्रतिभूति के आधार पर ऋण सुविधा सुरक्षित करें। दूसरा उद्देश्य यह है कि गारंटी सुविधा का उपयोग करने वाले ऋणदाता उधारकर्ताओं को संमिश्र ऋण उपलब्ध कराएँ, ताकि उधारकर्ता एक ही एजेन्सी से सावधि ऋण एवं कार्यशील पूँजी दोनों सुविधाएँ प्राप्त करें।

 

ऋण गारंटी योजना ऋणदाता को पुनर्आश्वस्त करती है कि यदि संपार्श्विक प्रतिभूति से मुक्त ऋण सुविधा का उपयोग करने वाली एमएसई इकाई ऋणदाता को देयताएँ पूरी करने में असमर्थ रहती है, तो गारंटी ट्रस्ट ऋण सुविधा के 70/80/85% तक ऋणदाता के नुकसान की भरपाई करेगा।

 
ट्रस्ट की स्थापना से, इस योजना के अंतर्गत प्रस्तावों की संख्या और संवितरित ऋण राशि में महत्त्वपूर्ण वृद्धि हुई है। निम्नलिखित सारणी में वित्तवर्ष 2001 से सीजीटीएमएसई के परिचालन के उल्लेखनीय तथ्य दिए गए हैं।

सीजीटीएमएसई योजना के अंतर्गत ऋण में संवृद्धि

 

अवधि

अनुमोदित प्रस्तावों की संख्या

अनुमोदित ऋण राशि (लाख रुपये)

विव 2000-01

विव 2001-02

विव 2002-03

विव 2003-04

विव 2004-05

विव 2005-06

विव 2006-07

विव 2007-08*

विव 2008-09*

विव 2009-10*

951

2,296

4,955

6,603

9,516

16,284

27,457

30,825

53,708

151,387

606

2,952

5,867

11,760

32,677

46,191

70,453

105,584

219,940

687,511

 

स्रोत: विकास आयुक्त (एमएसएमई)

योजना, पात्रता मानदंड, शुल्क, आदि की विस्तृत जानकारी के लिए सीजीटीएमएसई की वेबसाइट देखें।

 

ऋण श्रेणीनिर्धारण

Credit Rating

ऋण श्रेणीनिर्धारण किसी व्यक्ति या संगठन की ऋण-सुपात्रता अर्थात् ऋण चुकौती के लिए उधारकर्ता की क्षमता का आकलन है। यह श्रेणीनिर्धारण कोई तृतीय पक्ष का ऋण मूल्यांकनकर्ता करता है और इससे लघु एवं मध्यम उद्यम की ऋण प्रबंध की सामर्थ्य प्रदर्शित होती है। विभिन्न वित्तीय एवं गैर-वित्तीय मापदंडों, पिछले ऋण संबंधी इतिवृत्त(इतिहास) और उस अर्थव्यवस्था एवं उद्योग-क्षेत्र के संदर्भ में उसके भावी दृष्टिकोण पर विचार करने के बाद ऋण श्रेणीनिर्धारण निर्दिष्ट किया जाता है, जिसमें एमएसएमई कार्यरत है या कार्य करना चाहेगा।   

अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए सरकारी प्रोत्साहन

Government Promotion for MSME

चूँकि भारत में कृषि के बाद, एमएसएमई क्षेत्र रोज़गार उपलब्ध कराने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र है, अत: भारत सरकार इस क्षेत्र के विकास के लिए सक्रिय रूप से रुचि ले रही है। इस क्षेत्र के लिए ऋण की उपलब्धता में सुधार के लिए, भारत सरकार एमएसएमई उद्यमियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करती है कि वे अपना श्रेणीनिर्धारण कराएँ। इससे एमएसएमई को ऋणदाताओं से बेहतर ऋण सुविधाएँ प्राप्त करने में मदद मिलेगी और साथ ही उन्हें अपनी साख /प्रतिष्ठा स्थापित करने में भी मदद मिलेगी।

 
सरकार ने एक सब्सिडी योजना शुरू की है, जिसमें राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम श्रेणीनिर्धारण शुल्क के एक अंश की प्रतिपूर्ति करता है। इस योजना के अनुसार, नामित श्रेणीनिर्धारण एजेन्सी को श्रेणीनिर्धारण के लिए दिए गए शुल्क के प्रति 75% तक प्रतिपूर्ति की जाती है, किंतु इस प्रतिपूर्ति की अधिकतम सीमा 50 लाख रुपये तक की कुल बिक्री वाले उद्यमों के लिए 25000 रुपये, 50 लाख से 2 करोड़ रुपये तक की कुल बिक्री वाले उद्यमों के लिए 30000 रुपये और 2 करोड़ से रुपये अधिक की कुल बिक्री वाले उद्यमों के लिए 40000 रुपये है।  यह योजना एमएसएमई को इस बात के लिए प्रोत्साहित करती है कि वे अपना श्रेणीनिर्धारण कराएँ। यह सब्सिडी केवल पहले वर्ष के लिए उपलब्ध है। नवीकरण के लिए, एमएसएमई को खुद श्रेणीनिर्धारण एजेन्सी को भुगतान करना होगा। भारत के श्रेणीनिर्धारण बाज़ार की कुछ प्रमुख एजेन्सियों का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है।

राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम की “कार्यनिष्पादन एवं श्रेणीनिर्धारण योजना” के विवरण के लिए यहाँ क्लिक करें।

एमएसएमई श्रेणीनिर्धारण

MSME Rating

 

श्रेणीनिर्धारण के लाभ

  • ऋण सुपात्रता के बारे में तृतीय पक्ष का स्वतंत्र मूल्यांकन : इससे सुप्रसिद्ध स्वतंत्र एजेन्सियों से गुणवत्ता का प्रमाण मिल जाता है।
  • निधीयन प्राप्त करने के लिए बेहतर स्थिति : इससे बैंकों, ऋणदाताओं और वित्तीय संस्थाओं में स्वीकार्यता बढ़ती है और सस्ती दर पर शीघ्रता से ऋण प्राप्त करने में मदद मिलती है। इसके परिणामस्वरूप संपार्श्विक प्रतिभूति की अपेक्षाओं में कमी आती है तथा उधार की शर्तें सरल हो जाती हैं।
  • मूल्यवर्द्धन श्रृंखला के भागीदारों में विश्वास बढ़ना : श्रेणीनिर्धारण से खरीदारों, आपूर्तिकर्ताओं और सहयोगकर्ताओं में साख स्थापित करने में मदद मिलती है। इससे अन्य जोखिमधारकों के साथ बेहतर शर्तों के लिए मोलभाव/बातचीत में मदद मिलती है।
  • न्यूनतम मानकों का निर्धारण : श्रेणीनिर्धारण से अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों को वित्तीय एवं गैर-वित्तीय मानदंडों के संदर्भ में अपने प्रतिस्पर्द्धियों की तुलना में अपनी स्थिति पहचानने में मदद मिलती है। इससे न्यूनतम मानकों के निर्धारण मदद मिलती है और उनमें और अधिक सुधार के अवसर प्राप्त होते हैं।
  • ब्रांड निर्माण : स्वतंत्र एजेन्सी के श्रेणीनिर्धारण से विभिन्न जोखिमधारकों, जैसे - खरीदारों, आपूर्तिकर्ताओं और सहयोगकर्ताओं/संयुक्त उद्यम के भागीदारों, आदि की नज़रों में एमएसएमई की पहचान में सुधार होता है।
  • ब्याजदर का लाभ : कुछ बैंक /वित्तीय संस्थाएँ एसएमई रेटिंग एजेन्सी ऑफ़ इंडिया लि. (स्मेरा) से श्रेणीनिर्धारण प्राप्त एमएसएमई को ब्याजदरों में छूट देती हैं।

प्ररूपी श्रेणीनिर्धारण प्रक्रिया

सामान्य रूप से, सूचना प्राप्त होने से लेकर श्रेणीनिर्धारण प्रदान किए जाने तक की संपूर्ण प्रक्रिया में दो से चार सप्ताह का समय लगता है। एक प्ररूपी श्रणीनिर्धारण प्रक्रिया में निम्नलिखित चरम शामिल होते हैं :

  1. श्रेणीनिर्धारण के लिए अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यम का अनुरोध
  2. वित्तीय एवं प्रबंधकीय सूचनाओं का प्रस्तुतीकरण
  3. कार्यदायित्व और विस्तृत प्रश्नावली को अंतिम रूप देना
  4. कार्यस्थल का दौरा एवं प्रबंधतंत्र से चर्चा
  5. गहन विश्लेषण, उद्योगगत अनुसंधान और प्रारूप रिपोर्ट
  6. श्रेणीनिर्धारण समिति के समक्ष प्रस्तावित श्रेणीनिर्धारण
  7. अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यम को श्रेणीनिर्धारण की सूचना देना
  8. श्रेणीनिर्धारण समिति के समक्ष अपील
  9. अंतिम रिपोर्ट का प्रकाशन

श्रेणीनिर्धारण प्राप्त करने के लिए आवश्यक दस्तावेज़ *

  • लघु उद्योग पंजीकरण प्रमाणपत्र /उद्यमी ज्ञापन
  • संस्था के अंतर्नियम एवं बहिर्नियम
  • पिछले तीन वर्ष के लेखापरीक्षित लेखे
  • परियोजना रिपोर्ट, जिसमें परियोजना की रूपरेखा, परियोजना लागत, वित्तीयन संरचना (केवल नई परियोजनाओं के लिए) शामिल हो
  • संयंत्र एवं मशीनों, आदि का बीमा संबंधी विवरण
  • उत्पादों की सूची, तकनीकी एवं वितरण /विपणन सहयोग (यदि की हो), अंतिम उपयोगकर्ता-वर्ग, हस्तगत/प्राप्त क्रय-आदेश, आदि का विवरण
  • संयंत्र स्थापना, उपकरण /मशीनों, समयबद्ध कार्यक्रम, आदि के बारे में विवरण
  • उपलब्ध कर रियायत, सब्सिडी (यदि की हो)
  • बैंकों से उपलब्ध ऋण/उधार सुविधा से संबद्ध अग्रिम का स्वरूप और प्रदत्त प्रतिभूति
  • गुणवत्ता प्रमाणन, कोई पुरस्कार जीता हो, निर्यात विवरण
  • एमएसएमई और बैंक के बीच हुए संव्यवहार के विवरण सहित बैंकर की रिपोर्ट (गोपनीय)

* टिप्पणी: यह सूची निर्देशात्मक है और विभिन्न एजेन्सियों के लिए भिन्न-भिन्न होती है।

श्रेणीनिर्धारण एजेन्सी से संपर्क करना

श्रेणीनिर्धारण एजेन्सी से ऑनलाइन संपर्क किया जा सकता है। इच्छुक व्यक्ति फ़ॉर्म डाउनलोड कर, उसे भरकर तथा आवश्यक दस्तावेज़ संलग्न कर अपेक्षित शुल्क के साथ एजेन्सी को भेज सकता है। इसके अलावा, कोई एमएसएमई एजेन्सी के कार्यालय से संपर्क कर सकता है, क्योंकि अधिकतर एजेन्सियों के प्रमुख नगरों में कार्यालय मौजूद हैं। श्रेणीनिर्धारण एजेन्सियाँ अपनी वेबसाइट, विक्रय कार्यालय और प्रतिनिधियों के नेटवर्क के माध्यम से श्रेणी-2 और श्रेणी-3 के नगरों में भी अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों तक अपनी पहुँच रखती है।

श्रेणीनिर्धारण के उपयोग एवं वैधता

नियत श्रेणीनिर्धारण जारी के जाने की तिथि से विशिष्टत: एक वर्ष के लिए वैध होता है, बशर्ते उस अवधि के दौरान की ऐसा महत्त्वपूर्ण परिवर्तन /घटना न घटी हो, जिसका संगठन /परियोजना के व्यवसाय और वित्तीय मापदंडों पर वस्तुत: पड़ सकता हो। सामान्यत: यह सिफारिश की जाती है कि इकाइयाँ अपना श्रेणीनिर्धारण वार्षिक आधार पर नवीकृत कराएँ।

नियत श्रेणीनिर्धारण निम्नलिखित प्रयोजनों के लिए उपयोग की जा सकती है:

  • ऋण-सुपात्रता स्थापित करने के लिए बैंक, ऋणदाता और वित्तीय संस्थाओं को प्रस्तुत करना
  • संपार्श्विक प्रतिभूति की अपेक्षाओं, ऋण की शर्तों और ब्याजदर के लिए मोलभाव/बातचीत करने में
  • खरीदारों, आपूर्तिकर्ताओं और तकनीकी सहयोगकर्ताओं तथा संयुक्त उद्यम के भागीदारों की नज़रों में साख /प्रतिष्ठा स्थापित करने में
  • कंपनी की सबलताएँ /दुर्बलताएँ तथा सुधार वाले क्षेत्र पहचानने में
  • उद्योग-विशेष में प्रचलित सर्वोत्तम प्रक्रियाओं की पहचान करने में / पता लगाने में
  • विदेशी व्यवसाय भागीदारों के साथ संपर्क स्थापित करने में

एमएसएमई श्रेणीनिर्धारण के बारे में भ्रांतियाँ

भ्रांति 1: ऋणदाता और बैंक अक्सर एमएसएमई उद्यमों को उनके छोटे आकार और गैर-मानकीकृत प्रक्रियाओं के कारण हेय श्रेणी का समझते हैं।

वास्तविकता : क्रिसिल के आँकड़ों के अनुसार, पहली पीढ़ी के उद्यमियों के समर्थन से चलने वाली कंपनियों की ऐसी अच्छी संख्या है, जिनकी व्यवसाय काफी सुदृढ़ है और उन्होंने मज़बूत ब्रांड निर्मित किए हैं तथा बड़ी वैश्विक कंपनियों सहित देशीय कंपनियों की प्रतिस्पर्द्धा का सामना करने की क्षमता सिद्ध की है। ऐसी कंपनियों को उच्च श्रेणीनिर्धारण प्राप्त हुआ है और वे रियायती दरों पर वित्त प्राप्त करने में समर्थ हुई हैं।    

भ्रांति 2: अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) आम तौर पर व्यवसाय के संबंध में विश्वसनीय वित्तीय एवं गैर-वित्तीय सूचनाएँ उपलब्ध नहीं कराते हैं।

वास्तविकता: अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) श्रेणीनिर्धारण प्राप्त होने से होने वाले मूर्त लाभ समझते हैं और इसलिए अपेक्षित सूचनाएँ उपलब्ध कराने के लिए तैयार रहते हैं। इसके अलावा, एमएसएमई उद्यमों की एक बड़ी संख्या है, जो बड़े घरेलू एवं विदेशी व्यवसायियों के साथ लेनदेन करते हैं और वे उच्च गुणवत्ता वाली सटीक वित्तीय एवं व्यवसाय संबंधी सूचनाओं का रखरखाव करते हैं। इन लघु एवं मध्यम उद्यमों को अक्सर उच्च श्रेणीनिर्धारण प्राप्त होता है।  

भ्रांति 3: एमएसएमई के लिए, श्रेणीनिर्धारण ऋणदाताओं से अनुकूल शर्तों का लाभ लेने का एक साधन मात्र है।

वास्तविकता: श्रेणीनिर्धारण एमएसएमई व्यवसायों के लिए एक रिपोर्ट-कार्ड हैं, जो उनकी सबलताएँ और दुर्बलताएँ दर्शाता है। इससे एमएसएमई को अपने प्रतिस्पर्द्धियों की तुलना में अपनी स्थिति और सुधार के क्षेत्र पहचानने में मदद मिलती है। फिर, श्रेणीनिर्धारण से अपने-आप कोई लाभ प्राप्त नहीं होता है, बल्कि यह एक साधन मात्र है और इसकी प्रभाविता इस बात पर निर्भर करती है कि व्यवसाय भागीदारों के साथ मोलभाव/बातचीत करते समय इसका कैसे प्रयोग किया जाता है। इसके माध्यम से अत्यधिक लाभ मिलने की संभावनाएँ मौजूद हैं।

भ्रांति 4: किसी लघु एवं मध्यम उद्यम को प्राप्त श्रेणीनिर्धारण ऋणदात्री संस्थाओं के आंतरिक श्रेणीनिर्धारण को प्रतिस्थापित कर सकता है।

वास्तविकता: एजेन्सियों से प्राप्त श्रेणीनिर्धारण ऋणदात्री संस्थाओं के आंतरिक श्रेणीनिर्धारण को प्रतिस्थापित करेगा। ऋणदात्री संस्थाएँ अपने आंतरिक श्रेणीनिर्धारण के आधार पर प्रतिनिधि ब्याजदर का आकलन करते हैं। अनेक एमएसएमई अपने आंतरिक श्रेणीनिर्धारण से अनभिज्ञ होते हैं और यदि उसकी जानकारी होती भी हैं, तो ऐसे श्रेणीनिर्धारण पर पहुँचने के आधार से अनजान रहते हैं। श्रेणीनिर्धारण एजेन्सियों से प्राप्त बाह्य श्रेणीनिर्धारण के संबंध में एमएसएमई उधारकर्ता को न केवल श्रेणीनिर्धारण की जानकारी होती है, बल्कि एक बाहरी दृष्टिकोण से उसके आकलन का आधार भी पता होता है, जिससे उसे प्रतिस्पर्द्धी बढ़त प्राप्त होती है। इस जानकारी से एमएसएमई अपने आंतरिक श्रेणीनिर्धारण में सुधार भी कर सकता है और ऋणदाता वर्ग से बेहतर शर्तों का लाभ उठाने का प्रयास भी सकता है।     

 

 

 

 

भारत में श्रेणीनिर्धारण एजेन्सियाँ

Rating Agencies in India

भारतीय श्रेणीनिर्धारण उद्योग समय के साथ-साथ विकसित हुआ है। भारतीय श्रेणीनिर्धारण उद्योग के अंर्तगत मुख्यत: क्रिसिल, इक्रा, केयर, ओनिक्रा, फ़िच और स्मेरा आते हैं। क्रिसिल भारत की सबसे बड़ी श्रेणीनिर्धारण एजेंसी है, जिसका बाजार हिस्सा 60% से भी अधिक है। यह श्रेणीनिर्धारण संबंधी सभी सेवाएँ प्रदान करने वाली संपूर्ण एजेन्सी है, जो विनिर्माण, सेवा, वित्तीय और एसएमई क्षेत्रों में अपनी सेवाएँ प्रदान कर रही है। स्मेरा की स्थापना केवल एसएमई उद्यम क्षेत्र को श्रेणीनिर्धारण सेवाएँ प्रदान करने के लिए की गई है।

   

लघु एवं मध्यम उद्यम श्रेणीनिर्धारण एजेन्सी (स्मेरा)

 

स्मेरा सिडबी, डन ऐंड ब्रैडस्ट्रीट इन्फ़ॉर्मेशन सर्विसेज़ इंडिया प्रा. लिमिटेड (डीएंडबी) और देश के कई अग्रणी बैंकों की संयुक्त पहल का परिणाम है। स्मेरा पहली भारतीय श्रेणीनिर्धारण एजेन्सी है, जो मुख्यत: भारतीय एमएसएमई वर्ग पर केंद्रित है। स्मेरा 7000 श्रेणीनिर्धारण प्रक्रियाएँ पूरी कर चुका है।

 

 

श्रेणीनिर्धारण प्रक्रिया

श्रेणीनिर्धारण कार्यपद्धतियाँ

  श्रेणीनिर्धारण स्तर

 श्रेणीनिर्धारण शुल्क

 

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क्रिसिल

क्रिसिल भारत की सबसे बड़ी ऋण श्रेणीनिर्धारण एजेन्सी है। इसकी स्थापना 1987 में की गई थी। विश्व की सबसे बड़ी श्रेणीनिर्धारक एजेन्सी स्टैण्डर्ड ऐंड पूअर्स क्रिसिल में प्रमुख शेयरधारक है। अब तक क्रिसिल ने पूरे भारत में 5178 से भी अधिक एसएमई कंपनियों का श्रेणीनिर्धारण किया है और 10,000 से अधिक एसएमई श्रेणीनिर्धारण जारी किए हैं।

 

 

 

श्रेणीनिर्धारण विवरण

 

श्रेणीनिर्धारण शुल्क

 

एसएमई श्रेणीनिर्धारण के लिए संपर्क

 

केयर श्रेणीनिर्धारण

1993 में स्थापित क्रेडिट एनॉलिसिस ऐंड रिसर्च लिमिटेड (केयर) एक ऋण श्रेणीनिर्धारण, अनुसंधान और परामर्शदात्री समिति है, जिसे भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (आईडीबीआई) केनरा बैंक, यूनिट ट्रस्ट ऑफ इण्डिया (यूटीआई) और अन्य वित्तीय एवं ऋणदात्री संस्थाओं ने प्रवर्तित किया है। 1993 में अपनी स्थापना से अब तक केयर ने 7564 से अधिक श्रेणीनिर्धारण दायित्व पूरे किए हैं।

  


केयर श्रेणीनिर्धारण के विवरण के लिए केयर एसएमई रेटिंग देखें।


ओनिक्रा क्रेडिट श्रेणीनिर्धारण एजेंसी

एक श्रेणीनिर्धारण एजेंसी के रूप में ओनिक्रा की स्थापना 1993 में श्री सोनू मीरचंदानी ने की थी। यह आँकड़ों का विश्लेषण करती है और व्यक्तियों तथा लघु एवं मध्यम उद्यमों(एसएमईयों) के लिए श्रेणीनिर्धारण समाधान उपलब्ध कराती है। ओनिक्रा को वित्त, लेखांकन, बैक-एंड प्रबंध, आवेदन संसाधन, विश्लेषिकी और ग्राहक संबंध जैसे क्षेत्रों में अनेकानेक व्यवसाय प्रक्रियाओं के परिचालन का व्यापक अनुभव है। इसने 2500 से भी अधिक एसएमई कंपनियों का श्रेणीनिर्धारण किया है।

   

 

श्रेणीनिर्धारण प्रक्रियाएँ और स्तर

मूल्यन

श्रेणीनिर्धारण कराएँ

आवेदनपत्र

 

 

फ़िच रेटिंग्स

फ़िच रेटिंग्स विश्व के ऋण बाजारों को स्वतंत्र व प्रत्याशित ऋण-राय, अनुसंधान और आँकड़े उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध एक विश्वस्तरीय श्रेणीनिर्धारण एजेन्सी है। फिच रेटिंग्स का मुख्यालय न्यूयार्क और लंदन में है और यह फिच समूह का हिस्सा है।

 

 

श्रेणीनिर्धारण प्रक्रिया और स्तर एवं शुल्क

 

 

एसएमई श्रेणीनिर्धारण के लिए संपर्क

 

इक्रा

इक्रा की स्थापना 1991 में अग्रणी भारतीय वित्तीय संस्थाओं और वाणिज्य बैंकों ने की थी। अंतरराष्ट्रीय ऋण श्रेणीनिर्धारम एजेन्सी, मूडीज, इसकी सबसे बड़ी शेयरधारक है। इक्रा में एमएसएमई क्षेत्र के लिए समर्पित व्यावसायिकों का एक दल है और इसने एमएसएमई क्षेत्र के लिए पंक्तिबद्ध माप-स्तर विकसित किए हैं, जिससे समकक्ष इकाइयों की तुलना में न्यूनतम मानदंड निर्धारित करना आसान होता है।

 

 

श्रेणीनिर्धारण प्रक्रिया और स्तर

एसएमई श्रेणीनिर्धारण के लिए संपर्क

 


 

सिबिल के पास ऋण संबंधी सूचनाएँ

Credit Information with CIBIL

 

वाणिज्यिक ऋण ब्यूरो

वाणिज्यिक ऋण ब्यूरो एक ऐसा संगठन है, जो विभिन्न स्रोतों से ऋण संबंधी सूचनाएँ एकत्र करता है और विभिन्न उपयोगों के लिए वाणिज्यिक उपभोक्ताओं के बारे में उपभोक्ता ऋण सूचनाएँ उपलब्ध कराता है। यह सूचना-भंडार का रखरखाव करता है, जिसमें वाणिज्यिक उधारकर्ताओं के ऋण संबंधी इतिहास शामिल होता है। इससे ऋणदाताओं को ऋण-सुपात्रता एवं ऋण चुकौती की सामर्थ्य का निर्धारण करने में मदद मिलती है और वह ब्याजदर एवं ऋण की अन्य शर्तें तय कर सकता है। यह ऋण सूचना रिपोर्ट के रूप में सूचनाएँ उपलब्ध कराता है। यह उधारकर्ता के ऋण भुगतान इतिहास के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट होती है, जिसे विभिन्न ऋण मंजूरकर्ताओं से प्राप्त सूचनाओं से संकलित किया जाता है।


भारत में, सिबिल का वाणिज्यिक ब्यूरो वाणिज्यिक उधारकर्ताओं के ऋण इतिहास की विस्तृत सूचनाओं के आँकड़ा-आधार पर निर्भर करता है। एसएमई को उपलब्ध ऋणों की मात्रा में अधिकाधिक वृद्धि करने की अपनी पहल के अधीन, सिडबी का परियोजना प्रबंध प्रभाग अपनी एसएमई वित्तीयन एवं विकास परियोजना के अधीन सिबिल को सहयोग दे रहा है, जिसका लक्ष्य बैंक की लाभप्रदता में वृद्धि और बाज़ार पहुँच बढ़ाने (सुदृढ़ ऋण निर्णयों के माध्यम से) और गैर-निष्पादक ऋणों में कमी करने (ऋण संबंधी सूचनाओं का उपयोग करते हुए) के साथ, अल्प-भेदित एसएमई क्षेत्र के लिए ऋण प्रवाह सुकर बनाना है।

ऋण सूचना रिपोर्ट (सीआईआर)

इसमें निम्नलिखित सूचनाएँ निहित होती हैं :

  • उधारकर्ता संबंधी सामान्य सूचनाएँ, जैसे :
    • नाम और पता
    • डी-यू-एन-एस® संख्या
    • पहचान संबंधी अन्य संख्याएँ, जैसे – पैन, पंजीकरण संख्या
    • विधिक संघटन
    • संबंधगत विवरण; जैसे प्रमुख शेयरधारक, निदेशक और उनके पते तथा डी-यू-एन-एस® संख्या
    • उधारकर्ता के बारे में की गई पूछताछ की संख्या
  • खाता संबंधी विवरण:
    • ऋण सुविधाओं की संख्या
    • ऋण का स्वरूप
    • ऋण की राशि
    • बकाया राशि
    • आस्ति वर्गीकरण
    • इरादतन चूककर्ता एवं वाद-दायर मामलों की स्थिति
    • गारंटीदाता के विवरण

एमएसएमई के लिए ऋण सूचना रिपोर्ट का महत्त्व

  • साफ-सुथरे ऋण इतिहास से उधारकर्ता की ऋण-सुपात्रता बेहतर हो जाती है।
  • इससे बैंकों, ऋणदाताओं और वित्तीय संस्थाओं में स्वीकार्यता बढ़ती है।
  • इससे सस्ती दर पर और शीघ्रता से ऋण मिलने में मदद मिलती है।
  • इससे संपार्श्विक प्रतिभूति की आवश्यकता में कमी आती है और ऋण की शर्तें सरल हो जाती है।

ऋण रिपोर्ट में सुधार की विधियाँ

  • समय पर चुकौती
  • ऋणों की विलंबित चुकौती / भुगतान न किए जाने संबंधी गलत सूचनाओं में आशोधन। यह कार्य ऋण मंजूरकर्ता से सूचित कर किया जाना चाहिए और ऋण मंजूरकर्ता आगे सिबिल को सूचित करेगा।

अधिक जानकारी के लिए, आप  सिबिल की वेबसाइट देखें।

हरित वित्त

Green Finance

हरित वित्त एक ऐसा बाज़ार-आधारित निवेश या उधार कार्यक्रम है, जो जोखिम मूल्यांकन में पर्यावरणीय प्रभावों को भी शामिल करता है, या पर्यावरण संबंधी प्रोत्साहनों के माध्यम से व्यवसायगत निर्णय संचालित करता है। भारत में, सिडबी ने अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यम क्षेत्र में हरित और ऊर्जा-दक्ष प्रौद्योगिकियों के लिए ऋणपोषण को बढ़ावा देने के लिए कई पहल की हैं। केएफ़डब्ल्यू, जर्मनी तथा जेआईसीए, जापान से द्विपक्षीय ऋण-व्यवस्था के अधीन, सिडबी स्वच्छ उत्पादन और ऊर्जा-दक्ष प्रौद्योगिकियों / उत्पादन प्रक्रियाओं में निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए विशिष्ट ऋण योजनाएँ चला रहा है। ये विशिष्ट योजनाएँ दोहरे दृष्टिकोण के साथ काम करती है, अर्थात् हरित या ऊर्जा-दक्ष प्रौद्योगिकियों में निवेश प्रोत्साहित करने के लिए रियायती ऋण तथा उद्यम-समूहों के लिए समूह-विशिष्ट संबंधी सूचनाओं का प्रचार-प्रसार शुरू करना।


हरित वित्तीयन एवं विकास में सिडबी की भूमिका पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

 

ऊर्जा बचत के लिए सिडबी की वित्तीयन योजना

दि जापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेन्सी (जेआईसीए) ने अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की ऊर्जा बचत परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए सिडबी को ऋण-व्यवस्था उपलब्ध कराई है। इस योजना के अंतर्गत, सिडबी और साथ ही साथ बैंकों /राज्य वित्त निगमों एवं गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (एनबीएफ़सी) को पुनर्वित्त के माध्यम से, अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है, ताकि एमएसएमई इकाइयों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जा सके कि वे ऊर्जा खपत कम करने, ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, कार्बन-डाई-ऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने और दीर्घकालिक लाभप्रदता में वृद्धि करने के उद्देश्य से, संयंत्र एवं मशीनों /उत्पादन प्रक्रियाओं में ऊर्जा बचत संबंधी निवेश करें।



योजना के बारे में अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें।

इस योजना के अंतर्गत पात्र ऊर्जा बचत उपकरणों की सूची देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।

आईडीबीआई बैंक की पर्यावरण संबंधी सेवाएँ

आईडाबीआई बैंक ने पर्यावरणीय बैंकिंग के क्षेत्र में भारतीय बैंकिंग जगत में पथप्रदर्शक भूमिका अदा की है और इस क्षेत्र में 17 वर्ष से अधिक से सक्रिय है।

आईडाबीआई बैंक ने एक विशिष्ट दल गठित किया है, जो ग्राहकों को जलवायु परिवर्तन और विशेष रूप से कार्बन क्रेडिट संबंधी सलाहकार सेवाएँ उपलब्ध कराने पर कार्य कर रहा है, ताकि वे स्वच्छ विकास कार्यप्रणाली /क्योटो प्रोटोकॉल के कार्बन क्रेडिट तथा स्वैच्छिक उत्सर्जन कमी प्राधिकरणों से संबंधित मामलों की देखरेख कर सकें।

इस दल ने कार्बन क्रेडिट की प्राप्यराशियों के प्रति अग्रिम वित्तपोषण उपलब्ध कराने के लिए संरचित उत्पाद तैयार किया है। यह उत्पाद भारतीय परियोजना विकासकर्ताओं ने काफी पसंद किया है।

यह कार्बन क्रेडिट दल भारतीय चिलर उपयोगकर्ताओं को उच्च कार्बन चिलर से ऊर्जा-दक्ष न्यून कार्बन चिलर में रूपांतरित होने के लिए सर्वांगीण समाधान उपलब्ध कराने में विश्व बैंक के साथ घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है। इस कार्यक्रम के विस्तृत विवरण के लिए यहाँ क्लिक करें।  

आईडीबीआई बैंक ‘आईडीबीआई कार्बन डेवलेपमेन्ट्स’’ नाम का एक समाचार पत्रिका भी प्रकाशित करता है। इस पत्रिका में यूरोपियन यूनियन भत्तों का मूल्यन, प्रमाणित उत्सर्जन कमी, सीडीएम परियोजना पंजीकरण में हुई प्रगति तथा कार्बन बाज़ार में होने वाली अन्य घटनाएँ शामिल होती हैं।  

 

लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए ऊर्जा बचत संबंधी अन्य बैंकों की योजनाएँ

  • ऊर्जा दक्षता परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए बैंक ऑफ़ बड़ौदा की योजना
  • ऊर्जा दक्षता परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए बैंक ऑफ़ इंडिया की योजना
  • विभिन्न बैंको की ऊर्जा योजनाओं का डेटाबेस

एमएसएमई के लिए अतिरिक्त सुविधाएं

Additional Benefits for MSMEs

नियमित वित्तीयन सुविधाओं के अलावा, आपको अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए उपलब्ध अतिरिक्त वित्तीयन सुविधाओं का लाभ भी मिल सकता है।

महिलाएँ, अल्पसंख्यक एवं कमज़ोर वर्ग

Women, Minorities and Weaker Sections

केंद्र एवं राज्य सरकारों ने महिलाओं, अल्पसंख्यक एवं अनुसूचित जाति/अनु.जनजाति/अन्य पिछड़े वर्गों को सरलता से वित्त उपलब्ध कराने के लिए कई योजनाएँ चलाई हैं। विशिष्ट योजनाओं के अलावा, सरकार उन्हें विभिन्न अन्य योजनाओं के अधीन विशेष रियायतें भी देती है। 

महिलाओं के लिए योजनाएँ

महिला उद्यमियों के लिए विशेष योजनाओं के साथ-साथ, अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए उपलब्ध विभिन्न सरकारी योजनाएँ महिला उद्यमियों को विशेष प्रोत्साहन और रियायतें प्रदान करती हैं। उदाहरणार्थ, प्रधानमत्री रोज़गार योजना के अंतर्गत, महिला लाभार्थियों को वरीयता दी जाती है। सरकार ने इस योजना में महिलाओं की भागीदारी सरल बनाने के लिए कई प्रकार की छूट दी हैं। इसी प्रकार, एमएसएमई मंत्रालय के एमएसई समूह विकास कार्यक्रम के अंतर्गत, हार्ड इंटरवेन्शन के मामले में एमएसएमई मंत्रालय का अंशदान कुल परियोजना लागत के 30-80% के बीच होता है, किंतु महिलाओं के स्वामित्व वाले और उनके द्वारा प्रबंध किए जाने वाले समूहों के लिए एमएसएमई मंत्रालय का अंशदान परियोजना लागत का 90% तक होता है। इसी प्रकार, सूक्ष्म एवं लघु उद्यम ऋम गारंटी निधि योजना के अधीन, प्रदत्त ऋण के लिए सामान्यत: 75% तक गारंटी उपलब्ध होती है, किंतु महिलाओं के स्वामित्व वाले और उनके द्वारा प्रबंध किए जाने वाले अत्यंत लघु एवं लघु उद्यमों के लिए यह गारंटी 80% होती है। भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) भी महिला उद्यमियों के लिए विशेष योजनाओं का कार्यान्वयन करता है।  

महिला उद्यमियों के लिए विशेष योजनाओं में से कुछ का विवरण नीचे दिया गया है :


राष्ट्रीय महिला कोष

राष्ट्रीय महिला ऋण कोष (एनसीएफ़डब्ल्यू), जिसे सामान्यत: राष्ट्रीय महिला कोष के नाम से जाना जाता है, की स्थापना भारत सरकार ने 1993 में की थी। इसकी स्थापना अनौपचारिक क्षेत्र में निर्धन व्यक्तियों की ऋण आवश्यकताएँ तथा महिलाओं की आस्ति आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए की गई थी।  रा.म.कोष अत्यंत लघु उद्यमों की स्थापना सहित विभिन्न गतिविधियों के लिए अल्प वित्त संस्थाओं के माध्यम से अल्प ऋण प्रदान करता है।

महिलाओं के लिए व्यापार संबद्ध उद्यमिता सहायता एवं विकास योजना (ट्रीड)

महिलाओं को उनके अपने उद्यम स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से, सरकार महिलाओं के लिए व्यापार संबद्ध उद्यमिता सहायता एवं विकास योजना चलाती है। इस योजना के अंतर्गत गैर-कृषि गतिविधियों में महिलाओं के उद्यमिता कौशल का विकास कर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की परिकल्पना की गई है।  इस योजना के तीन प्रमुख घटक हैं :

  • महिलाओं में उद्यमिता के संवर्द्धन /प्रोत्साहन के लिए गैर-सरकारी संगठनों को कुल परियोजना लागत के 30% तक का सरकारी अनुदान। परियोजना लागत की शेष 70% राशि का वित्तीयन ऋणदात्री संस्था गतिविध चलाने के लिए ऋण के रूप में करती है, जैसा कि परियोजना में निहित है। 
  • महिला उद्यमियों को प्रशिक्षण प्रदान करने वाली संस्थाओं / गैर-सरकारी संगठनों को भारत सरकार का अनुदान, बशर्ते ये संस्थाएँ / संगठन भारत सरकार के अनुदान के 25%, पूर्वोत्तर राज्यों के मामले में 10%, के बराबर राशि अपने अंशदान के रूप में लगाएँ। 
  • सर्वेक्षण, अनुसंधान अध्ययन, मूल्यांकन अध्ययन, प्रशिक्षण मॉड्यूल की डिज़ाइनें तैयार करने, आदि के लिए राष्ट्रीय उद्यमिता विकास संस्थाओं और अन्य प्रतिष्टित संस्थाओं को 5 लाख रुपये तक का भारत सरकार का आवश्यकता-आधारित अनुदान।


प्रधानमंत्री का महिला रोज़गार सृजन कार्यक्रम

भारत सरकार पूरे राष्ट्र में रोज़गार सृजन कार्यक्रम का कार्यान्वयन कर रही है, जिसके अंतर्गत महिलाओं को निम्नलिखित रूप में रियायतें/ छूट दी जाती हैं :

  • शहरी महिला लाभग्राहियों के लिए, 25 प्रतिशत (सामान्य श्रेणी के लिए यह 15% है) की दर से परियोजना लागत की मार्ज़िन राशि, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए यह 35% है(सामान्य श्रेणी के लिए यह 25% है)। 
  • महिला उद्यमियों के मामले में, लाभग्राही का अंशदान परियोजना लागत का 5% होता है, जबकि सामान्य श्रेणी के लाभार्थियों के लिए यह परियोजना लागत का 10% है।
  • महिलाओं तथा अन्य कमज़ोर वर्गों के उधारकर्ताओं के मामले में, बैंक का वित्त परियोजना लागत का 95% होता है, जबकि सामान्य श्रेणी के लाभार्थियों के लिए यह परियोजना लागत का 90% है।


सूक्ष्म एवं लघु उद्यम ऋण गारंटी निधि ट्रस्ट (सीजीटीएमएसई)

सिडबी के सहयोग से भारत सरकार ने इसे स्थापित किया है। यह ट्रस्ट अपनी ऋण गारंटी योजना के अधीन एमएसई को 100 लाख रुपये तक के संपार्श्विक प्रतिभूति से मुक्त ऋणों के लिए ऋण गारंटी उपलब्ध कराता है और महिला उद्यमियों को प्रदत्त ऋणों को विशेष रियायत देता है, अर्थात् उन्हें गारंटी सुरक्षा 80% तक दी जाती है। यथा 31 अगस्त, 2010 को सीजीटीएमएसई ने महिला उद्यमियों के उद्यमों के लिए 2571 करोड़ रुपये की 78400 गारंटियाँ दी हैं, जो कुल गारंटियों का 20% है।

संवर्द्धनशील एवं विकासपरक सहायता

भारत सरकार विभिन्न संवर्द्धनशील एवं विकासपरक सहयोग के माध्यम से महिला उद्यमिता की महती भावना के संवर्द्धन के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।

  • एमएसएमई मंत्रालय, भारत सरकार विभिन्न प्रशिक्षणों और सहयोग सेवाओं के माध्यम से महिला उद्यमिता, विशेष रूप से प्रथम पीढ़ी की उद्यमियों को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त महत्त्व देता है।  इसी प्रकार, राज्य स्तर की विभिन्न विकास संस्थाएँ, बैंक /वित्तीय संस्थाएँ एवं गैर-सरकारी संगठन भी विशेष रूप से महिलाओं के लिए नियमित रूप से उद्यमिता विकास कार्यक्रम आयोजित करते हैं। ये महिला-केंद्रित कार्यक्रम संभावित महिला उद्यमियों का तकनीकी /प्रबंधकीय ज्ञान एवं कौशल बेहतर बनाते हुए, उन्हें आवश्यकतानुरूप प्रशिक्षित करने के लिए तैयार किए जाते हैं, ताकि वे विभिन्न क्षेत्रों में एमएसई शुरू कर सकें।  इन कार्यक्रमों को अक्सर सीमांत-पहुँच (आउट-रीच) कार्यक्रम कहा जाता है, क्योंकि ये ग्रामीण /अल्प विकसित क्षेत्रों में आयोजित के जाते हैं। ईएसडीपी/ईडीपी के कुल लक्ष्य में से 22.5% कार्यक्रम केवल अनु.जाति/अनु.जनजाति/महिलाओं और शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्तियों के लिए आयोजित किए जाते हैं। अनु.जाति/अनु.जनजाति/महिलाओं और शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्तियों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता है।
  • सिडबी भी उद्यमिता विकास कार्यक्रम आयोजित करने के लिए विभिन्न संस्थाओं को सहयोग देता है। यह पाया गया है कि सिडबी से सहायताप्राप्त ईडीपी से निम्नतम स्तर पर अनेक महिला उद्यमियों को अत्यंत लघु उद्यम स्थापित करने में मदद मिली है।
  • विपणन सहायता – एमएसएमई मंत्रालय ने महिला उद्यमियों के लिए एक योजना तैयार की है, ताकि महिला उद्यमियों के स्वामित्व वाली लघु एवं अत्यंत लघु विनिर्माण इकाइयों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों /प्रदर्शनियों में एमएसएमई स्टाल के अधीन उद्यमों से व्यापार-संपर्क स्थापित करने और उनका विकास करने के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जा सके और इस प्रकार ऐसी इकाइयों से निर्यात में वृद्धि की जा सके। इस योजना के अंतर्गत,
    • प्रदर्शनियो में किराया-मुक्त स्थान (6/( वर्ग मीटर) उपलब्ध कराया जाता है।
    • एक प्रतिनिधि के लिए वायुयान से इकोनॉमी किराये की 100% प्रतिपूर्ति। तथापि  समग्र सीमा 1.25 लाख रुपये होगी।


भारत में बैंकों की महिला-केंद्रित वित्तीयन योजनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए, यहाँ क्लिक करें।

अल्पसंख्यकों के लिए योजनाएँ

अल्पसंख्यकों के लिए अतिरिक्त वित्तीयन एजेन्सी उपलब्ध कराने के लिए, सरकार ने 1994 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम की स्थापना की। यह निगम विभिन्न योजनाओं के माध्यम से अल्पसंख्यकों के पिछड़े वर्गों के विकास का संवर्द्धन एवं प्रोत्साहन करता है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम की वित्तीय सहायता योजनाओं में से कुछ निम्नवत् हैं :


राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम की विभिन्न योजनाओं के बारे में अधिक जानकारी के लिए, यहाँ क्लिक करें।


तदनुरूपी राज्य स्तरीय माध्यम एजेन्सी के संपर्क विवरण के लिए, यहाँ क्लिक करें।

अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए योजनाएँ

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम अनुसूचित जाति के उन व्यक्तियों की आर्थिक विकास संबंधी गतिविधियों के लिए वित्तीयन करने, उन्हें अन्य स्रोतों से निधियाँ प्राप्त करने /दिलाने में मदद करने और उनके संवर्द्धन के लिए कार्य करने वाली शीर्ष संस्था है, जो ग़रीबी रेखा से दो गुना नीचे हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम अनुसूचित जातियों के लाभ के लिए वित्तीयन की विभिन्न योजनाएँ चलाता है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम की वित्तीय सहायता योजनाओं में से कुछ निम्नवत् हैं :

  • सावधि ऋण
  • अल्प ऋण वित्त
  • शिल्पी समृद्धि योजना
  • महिला समृद्धि योजना
  • महिला किसान योजना


उपर्युक्त वित्तीयन योजनाओं के बारे में अधिक जानकारी के लिए, यहाँ क्लिक करें।

तदनुरूपी राज्य स्तरीय माध्यम एजेन्सी के संपर्क विवरण के लिए, यहाँ क्लिक करें।

अन्य पिछड़ी जातियों के लिए योजनाएँ

राष्ट्रीय पिछड़ी जाति वित्त एवं विकास निगम, जो एक सरकारी उपक्रम है, इन जातियों के निर्धन वर्ग को राज्य-स्तरीय माध्यम एजेन्सियों और राज्य-स्तरीय माध्यम एजेन्सियों /स्व-सहायता समूहों के माध्यम से वित्तीय सहायता उपलब्ध कराता है, ताकि कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों, लघु व्यवसाय, कारीगरी एवं परंपरागत पेशों, तकनीकी एवं व्यवसायी व्यापार /पाठ्यक्रमों, परिवहन और सेवा क्षेत्र, आदि के क्षेत्र में इन जातियों के निर्धन वर्ग के कौशल विकास एवं स्वरोज़गार उद्यमों को सहायता देते हुए उनकी व्यापक आय-उपार्जक गतिविधियों को सहायता दी जा सके।


राष्ट्रीय पिछड़ी जाति वित्त एवं विकास निगम की विभिन्न वित्तीय सहायता योजनाएँ निम्नवत् हैं :

  • सावधि ऋण/मार्ज़िन राशि ऋण
    • महिलाओं के लिए नई स्वर्णिम विशेष योजना
    • नई आकांक्षा नामक शिक्षा ऋण योजना  
    • स्वयं सक्षम
  • अल्प वित्त योजनाएँ
    • महिला समृद्धि योजना


राष्ट्रीय पिछड़ी जाति वित्त एवं विकास निगम की उपर्युक्त वित्तीयन योजनाओं के बारे में अधिक जानकारी के लिए, यहाँ क्लिक करें।


तदनुरूपी राज्य स्तरीय माध्यम एजेन्सी के संपर्क विवरण के लिए, यहाँ क्लिक करें।

Tips: 
Fund Your Business

ब्याजदर संबंधी लाभ

Interest Rate Benefits

सरकार एवं सार्वजनिक संस्थाओं की कुछ प्रमुख वित्तीयन योजनाएँ नीचे दी गई हैं।


एमएसएमई मंत्रालय

सूक्ष्म एवं लघु उद्यम ऋण गारंटी निधि योजना

भारत सरकार ने अत्यंत लघु एवं लघु उद्यम क्षेत्र को संपार्श्विक प्रतिभूति से मुक्त ऋण उपलब्ध कराने के लिए सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम ऋण गारंटी निधि योजना शुरू की। मौजूदा एवं नए दोनों प्रकार के उद्यम इस योजना के अधीन शामिल किए जाते हैं। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम ऋण गारंटी निधि योजना के क्रियान्वयन के लिए, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय और भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम ऋण गारंटी निधि ट्रस्ट (सीजीटीएमएसई) नामक ट्रस्ट की स्थापना की। यह योजना औपचारिक रूप से 30 अगस्त, 2000 को शुरू की गई और 01 जनवरी, 2001 से इस योजना का परिचालन शुरू हुआ।    


इस योजना का विवरण जानने के लिए, यहाँ क्लिक करें।

ब्याज सब्सिडी पात्रता प्रमाणन योजना (आएसईसी)

ब्याज सब्सिडी पात्रता प्रमाणन योजना खादी कार्यक्रमों के लिए निधीयन का प्रमुख स्रोत है। यह मई, 1977 में शुरू की गई, और इसका उद्देश्य वास्तविक निधि आवश्यकता और बज़टीय स्रोतों से उसकी उपलब्धता के बीच के अंतर को पूरा करने के लिए बैंकिंग संस्थाओं से निधियाँ जुटाना है। ब्याज सब्सिडी पात्रता प्रमाणन योजना के अंतर्गत, संस्थाओं की आवश्यकता के अनुसार, पूँजीगत व्यय एवं कार्यशील पूँजी के लिए 4 प्रतिशत प्रतिवर्ष की रियायती ब्याजदर पर ऋण उपलब्ध कराया जाता है।  वास्तविक उधार दर और 4 प्रतिशत के बीच की अंतर-राशि का भुगतान केंद्र सरकार केवीआईसी के माध्यम से ऋणदात्री संस्था को करती है और इस प्रयोजन के लिए केवीआईसी को खादी अनुदान शीर्ष के अधीन निधि उपलब्ध कराई जाती है।  


योजना के बारे में अधिक जानकारी के लिए, यहाँ क्लिक करें।

सिडबी – भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक

प्रत्यक्ष ऋण योजना

प्रत्यक्ष ऋण योजना के अंतर्गत, पात्र लघु एवं मध्यम उद्यमों को सावधि ऋण एवं अन्य रूपों में, जैसे कार्यशील पूँजी सावधि ऋण व बिल भुनाई सहायता उपलब्ध कराई जाती है। इस योजना का लाभ विभिन्न प्रयोजनों जैसे – नई लघु उद्योग /सेवा क्षेत्र की इकाई की स्थापना / विस्तार /विविधीकरण /आधुनिकीकरण /प्रौद्योगिकी उन्नयन /गुणवत्ता प्रमाणन, विपणन संबंधी विभिन्न गतिविधियाँ चलाने के लिए, अतिरिक्त मशीनें /उपकरण खरीदने के लिए, एमपीबीएफ़ या मार्ज़िन में अंतर सहित कार्यशील पूँजी आवश्यकता पूरी करने के लिए चुनिंदा आधार पर किया जा सकता है।


योजना के बारे में अधिक जानकारी के लिए, यहाँ क्लिक करें।

 लघु उद्योगों के उत्पादों का विपणन

यह योजना घरेलू एवं निर्यात बाज़ारों में लघु उद्योगों की कुल बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से आवश्यक विभिन्न गतिविधियाँ चलाने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है। इस योजना के अधीन कॉर्पोरेट संस्थाओं के लिए भी वित्त शामिल है, ताकि वे लघु उद्योगों की विपणन क्षमता बेहतर बनाने के लिए उन्हें सहयोगी सेवाएँ और/या मूलभूत संरचनागत सुविधाएँ उपलब्ध करा सकें। इस योजना के अंतर्गत, लागू मूल उधार दर से 3.5% ऊपर तक ब्रॉड बैन्ड में ब्याजदर निर्धारित की जाती है और ब्याज की अवधि एक वर्ष की ऋम-स्थगन अवधि सहित तीन से आठ वर्ष तक हो सकती है। 


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स्वच्छतर उत्पादन उपाय योजना

इस योजना के अंतर्गत, चर्मशोधन एवं परिष्करण, वस्त्र आर्द्र संसाधन, धातु परिष्करण, इलेक्ट्रोप्लेटिंग एवं ढलाई वाले क्षेत्रों के लिए मौजूदा एसएमई इकाइयों को एकीकृत स्वच्छतर उत्पादन उपायों के क्रियान्वयन के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है। इस योजना के अधीन ऋम 8.5% प्रतिवर्ष की ब्याजदर पर उपलब्ध है।


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एमएसएमई क्षेत्र में ऊर्जा बचत परियोजनाओं के लिए योजना

इस योजना के अंतर्गत, सिडबी के माध्यम से और साथ ही साथ बैंकों /राज्य वित्त निगमों एवं गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (एनबीएफ़सी) को पुनर्वित्त के माध्यम से एमएसएमई को वित्तीय सहायता दी जाती है, ताकि उन्हें ऊर्जा खपत कम करने, ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, कार्बन-डाई-ऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने और दीर्घकाल में लाभप्रदता में वृद्धि करने के लिए संयंत्र एवं मशीनों /उत्पादन प्रक्रियाओं में ऊर्जा बचत संबंधी निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।   बैंड के अंदर ब्याजदर का विवरण नीचे दिया गया है :

स्थिर दर :      9.5   -      10% प्रतिवर्ष
चल दर :       9.75   -      10.5% प्रतिवर्ष

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एनएसआईसी  - राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम

बैंक ऋण सरलीकरण योजना :

एनएसआईसी ने अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों की आवश्यकता के अनुरूप उन्हें सावधि ऋण एवं कार्शील पूँजी की मंजूरी के लिए वाणिज्य बैंकों अर्थात् सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया, ऐक्सिस बैंक, ऐस बैंक, बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र, ओरियन्टल बैंक ऑफ़ कॉमर्स, एचएसबीसी, युनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया तथा चाइनाट्रस्ट कामर्शियल बैंक के साथ व्यवस्था की है।


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 बिल भुनाई योजना

इस योजना के अधीन वास्तविक व्यापार लेनदेनों, जैसे – लघु उद्योगों से प्रतिष्ठित सार्वजनिक लिमिटेड कंपनियों /राज्य एवं केंद्र सरकार के विभागों /उपक्रमों को की गई आपूर्तियों की खरीदारी के बिलों की खरीदारी /भुनाई की जाती है।

इस योजना में ब्याजदर निम्नवत् होगी (11/05/2009 से प्रभावी):

  • बीजी/एसडीआर/एफ़डीआर की प्रतिभूति के प्रति सहायता  : 11.25 % प्रतिवर्ष
  • ऊपर अंकित प्रतिभूतियों से इतर अन्य प्रतिभूतियों के प्रति सहायता : 13.25% प्रतिवर्ष से 16.25% (ऐसे मामलों में, प्र.का. सेतर पर उच्च शक्ति-प्राप्त स्वीकृति समिति को प्रत्येक मामले में अलग-अलग ब्याजदर निर्धारित करने अधिकार है)


विलंबित भुगतान पर ब्याजदर (11/05/2009 से प्रभावी) निम्नवत् लगाई जाएगी : -

  • 90 दिन से अधिक किंतु 180 दिन तक विलंब के लिए : सामान्य ब्याजदर से 2.50% अधिक
  • 180 दिन से अधिक विलंब के लिए : सामान्य ब्याजदर से 3.00% अधिक


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ऋण रिपोर्टें

Credit Reports

ऋण रिपोर्ट का आदर्श रूप हमारे समक्ष कंपनी की संपूर्ण रूपरेखा प्रस्तुत करती है, जिसमें वित्तीय जानकारी, भुगतान का इतिहास, प्रवृतियाँ, व्यवसायगत इतिहास, स्वामित्व विवरण, परिचालन संबंधी जानकारी और संबद्ध फर्मों के विवरण और विशेष घटनाएँ (जैसे – विशेष व्यावसायिक क़दम, आगजनी और दूसरी आपदाएँ, तथा तिमाही कार्यनिष्पादन) शामिल होती हैं। इन रिपोर्टों का उपयोग कर, संभावित ग्राहकों की ऋण समस्याओं के चेतावनी संकेत पहचान कर जोखिम कम किया जा सकता है। इससे आपको यह निर्णय करने में सहायता मिल सकती है कि क्या उधार की दृष्टि से आपकी कंपनी में आपके आपूर्तिकर्ताओं के लिए आकर्षक संभावनाएँ हैं। इससे व्यवसाय संबंधी प्रमुख प्रश्नों के उत्तर मिलते हैं, जो इस प्रकार हैं - 

  • क्या मेरी संभावनाएँ सुस्थापित हैं?
  • मेरी संभावनाओं के साथ किस स्तर का जोखिम जुड़ा है?
  • क्या मेरा ग्राहक भुगतान करेगा और कब?
  • मेरा ग्राहक/आपूर्तिकर्ता अपने समकक्ष समूहों के साथ कैसी तुलना करता है?
  • क्या मै आपूर्तिकर्ता पर यह विश्वास कर सकता हूँ कि वह वचन के अनुसार सुपुर्दगी करेगा?
  • क्या मेरे ग्राहक/ आपूर्तिकर्ता की वित्तीय स्थिति और स्थायित्व में परिवर्तन हुआ है?
  • क्या हम विशिष्ट नवारंभ परियोजना के लिए निधि सहायता दे सकते हैं?
  • मेरे संभावित ग्राहक ने जिस व्यवसाय योजना का प्रानुमान किया है, क्या वह बाजार की आवश्यकता के अनुरूप है?
  • क्या मेरे आपूर्तिकर्ता और ऋणदाता मुझे ऋण-सुपात्र समझते हैं?

व्यवसायगत ऋण सूचनाएँ: मिथक बनाम वास्तविकता

शायद आपको यह पता नहीं होगा कि आपकी व्यावसायिक सफलता के लिए आपकी ऋण संबंधी रूपरेखा कितनी महत्त्वपूर्ण है। निम्नलिखित सामान्य मिथक के कारण अपने-आपको पथ से भटकने न दें।


मिथक 1: मैं बहुत छोटा व नया हूँ। मुझे अपने ऋण संबंधी रूपरेखा के बारे में चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।

वास्तविकता 1:  छोटे और नए होने के कारण ऋण संबंधी सुदृढ़ रूपरेखा का निर्माण करना और भी अधिक आवश्यक है। चूँकि आप अपने आपूर्तिकर्ताओं, सेवाप्रदाताओं, बैंकों और बीमा कंपनियों के साथ संबंध स्थापित करने जा रहे हैं, इसलिए आपकी ओर से सर्वोत्तम पहल किया जाना महत्त्वपूर्ण है। वे आपके व्यवसाय के बारे में ऋण संबंधी जानकारियाँ आगे अन्य को उपलब्ध कराएँगे।

  • व्यवसाय पंजीकरण संबंधी जानकारी सार्वजनिक अभिलेखों से ली जाएगी, जिसमें स्वामित्व और व्यवसाय के विधिक नाम का उल्लेख होगा।
  • डाक कार्यालय व्यवसाय के पत्रव्यवहार के पते की पुष्टि करेगा।
  • जनोपयोगी सेवाप्रदाता, जैसे - टेलीफोन कंपनियाँ जनसांख्यिकी सूचनाएँ (व्यवसाय का नाम, पता, दूरभाष संख्या, व्यवसाय का स्वरूप) उपलब्ध कराएँगी।
  • आपने जो विज्ञापन कराएँ होंगे, उनके आधार पर व्यवसाय निर्देशिकाएँ (डायरेक्ट्रीज़) जानकारी देंगी।
  • आपूर्तिकर्ता और सेवाप्रदाता अपने अनुभवों के आधार पर रिपोर्ट देंगे कि आप अपने बिल, ऋण, लीज और अन्य भुगतान कैसे करते हैं।

चूँकि इन सभी सूचनाओं की रिपोर्टिंग होती है, यह अत्यंत आवश्यक है कि जैसे-जैसे आप अपने ऐसे संबंध और भागीदारियाँ विकसित करें, जिनसे आपका व्यवसाय लाभप्रद स्थिति में रहते हुए आगे बढ़े, तो आप अपनी साख / ऋण संबंधी रूपरेखा स्वच्छ बनाएँ रखें और यह सुनिश्चित करें कि आपकी प्रतिष्ठा सुदृढ़ बनी रहे।

 
मिथक 2: मुझे अपनी व्यावसायिक ऋण रूपरेखा में होने वाले परिवर्तनों की निगरानी करने की आवश्यकता नहीं है; चीज़ें जल्दी नहीं बदलती हैं।  

वास्तविकता 2: आपका प्रत्येक व्यावसायिक निर्णय और आपका प्रत्येक लेनदेन उन सूचनाओं को प्रभावित करता है, जिन्हें आपके आपूर्तिकर्ता, सेवाप्रदाता, ग्राहक और व्यावसायिक भागीदार आपके व्यवसाय के संबंध में देखते हैं। कुछ ऐसे बड़े लेनदेन होते हैं, जैसे - विक्रेताओं को भुगतान या लीज करना या बंधक भुगतान, किंतु साथ ही ऐसे छोटे लेन-देन, जैसे - उपकरण लीज़िग, विज्ञापन देना, नौवहन पैकेज़ या बीमे की हामीदारी भी हो सकते हैं। 

आपका प्रत्येक व्यवसायिक लेनदेन व्यवसाय जगत के उस नजरिये को प्रभावित करता है, जिस नज़रिये से वह आपके व्यवसाय को देखता है। ये सभी परिवर्तन उन शर्तों /सुविधाओं को प्रभावित कर सकते हैं, जो आपको अपने लेनदारों या बैंकों से प्राप्त हैं। इनसे बीमा के लिए भुगतान किए जाने वाली क़ीमतों पर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे आपके व्यवसाय की जीवनी शक्ति, नकदी प्रवाह और प्रतिष्ठा प्रभावित होती है। आज के वातावरण में, यह महत्त्वपूर्ण है कि आप अपना रिकार्ड सर्वोत्तम बनाए रखें; यह आपके व्यवसाय का जीवनवृत्त है और आपके साख सूचकांक, आपके विक्रेताओं एवं सेवाप्रदाताओं में आपके प्रति आकर्षण और आपकी ब्रांड छवि को प्रभावित करता है।

मिथक  3: मेरी व्यवसायगत ऋण रूपरेखा मेरे नक़दी प्रवाह को प्रभावित नहीं करती है।              

वास्तविकता 3: अपनी व्यवसायगत रूपरेखा की निगरानी करने से आपको पता चलता है कि आपका व्यावसायिक भागीदार आपको कैसे देखता है। विक्रेताओं, सेवाप्रदाताओं, बैंकों और बीमा कंपनियों से प्राप्त /उपलब्ध शर्तें, ऋण सीमाएँ, दरें आपके नक़दी प्रवाह को काफी हद तक प्रभावित करती हैं। अपनी रूपरेखा की निगरानी और सुदृढ़ साख सूचकांक बनाए रखने से आप सर्वाधिक अनुकूल शर्तें और दरें प्राप्त कर सकते हैं, जिससे आप धन की बचत कर सकते हैं और अपने ऩकदी प्रवाह में सुधार कर सकते हैं।


मिथक 4:  मेरी ऋण सुविधाएँ पूरी तरह से मेरे स्थानीय बैंक शाखा प्रबंधक के साथ मेरे संबंधों पर निर्भर हैं। मेरे ऋण आवेदन का कोई औपचारिक मूल्यांकन नहीं किया जाता है।

वास्तविकता 4: वास्तविकता में, मुस्कराहट के साथ और हाथ मिलाकर किए गए व्यावसायिक सौदे बहुत कम होते हैं। किसी ऋणदाता को आपका आवेदन प्रस्तुत किए जाने के बाद, पृष्ठभूमि में आपके ऋण संबंधी घटकों को संख्यात्मक मान दिए जाते हैं, जिनसे आपके आवेदन का स्वत: संसाधन होता है और इस प्रक्रिया में आपका ऋण प्रबंधक सीधे संलग्न नहीं हो सकता है।   .

व्यावसायिक ऋणों का आकार अपेक्षाकृत छोटा होने के कारण, अधिक संख्या में आवेदन संसाधित करने वाली अनेक वित्तीय संस्थाएँ निर्णय पर पहुँचने के लिए स्वचालित प्रक्रियाओं का प्रयोग करती हैं। ऐसी निर्णय प्रक्रिया वाले अधिकतर प्रचलित इंजन अधिकांश आवेदनों को स्वीकार या निरस्त करने के लिए कट ऑफ अंकों का प्रयोग करते हैं। केवल उन्हीं मामलों के लिए व्यक्तिगत मूल्यांकन पर निर्भर हुआ जाता है, जिनमें इस प्रक्रिया से कोई निष्कर्ष नहीं निकलता है। अत:, यद्यपि आपके निकट का बैंक अधिकारी आपको ऋण-सुपात्र समझता हो, वह यह निर्णय करने में असमर्थ हो सकता है कि क्या आपको ऋण दिया जाए या नहीं और किन शर्तों पर। यह केवल ऋण के बारे में सत्य नहीं है, बल्कि बीमा, लीज़ और इसी तरह की वित्तीय व्यवस्थाओं के लिए भी सत्य है।

उदाहरण के लिए, बैंक और वित्तीय संस्थाएँ वाणिज्यिक ऋण ब्यूरो (भारत में सिबिल) से दैनंदिन रूप में ऋण सूचना रिपोर्टें प्राप्त करते हैं। ये विभिन्न ऋण मंजूरकर्ताओं से प्राप्त जानकारी के आधार पर संकलित की गई होती हैं और संभावित उधारकर्ता के ऋण भुगतान इतिहास की तथ्यात्मक रिपोर्टें होती हैं।

 आप निम्नलिखित व्यवसाय/ ऋण सूचना-प्रदाताओं से ऋण रिपोर्टें प्राप्त कर सकते हैं।

डन ऐंड ब्रैडस्ट्रीट

एक्सपेरियन
मीरा इन्फ़ॉर्म

स्रोत : http://smallbusiness.dnb.com/ में प्रकाशित लेख से लिया गया।