फैक्टरिंग

फैक्टरिंग रिसीवेबल्स मैनेजमेन्ट और फाइनेन्सिंग मैनेजमेंट की एक पद्धति है। इसका उद्देश्य कैश फ्लो में सुधार लाना और विक्रेता के उधार जोखिम को कम करना है। बिल भुनाई और फोरफीटिंग जैसे दूसरी प्रकार के रिसीवेबल फाइनेन्स से हटकर, फैक्टरिंग में फैक्टर और विक्रेता के बीच संबंध लगातार बना रहता है, ताकि विक्रेता के रिसीवेबल्स फाइनेन्स और एडमिनिस्टर होते रहें। फैक्टर वित्तीय कंपनियाँ होती हैं जो अपने ग्राहक की उधार बिक्री के प्रति नकद प्रदान करती हैं और ग्राहक के उधारकर्ताओं के बीजकों पर भविष्य में होने वाले भुगतान को प्राप्त करने के अधिकार प्राप्त करते हैं।

फैक्टरिंग के प्रकार


भारत में फैक्टर कंपनियाँ ग्राहक की आवश्यकता के अनुसार विभिन्न प्रकार की फेक्टरिंग सेवाएं प्रदान करती हैं। फैक्टरिंग के विविध प्रकारों में –रिकोर्स सहित और बिना रिकोर्ट फैक्टरिंग, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय फैक्टरिंग, प्रकटीकृत और अप्रकटीकृत फैक्टरिंग शामिल हैं। इनमें से प्रत्येक फैक्टरिंग सेवा का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है। साथ ही भारतीय विदेशी बाजार में उनका अलग-अलग हिस्से की जानकारी भी दी गई हैं।


घरेलू और अंतरराष्ट्रीय फैक्टरिंग

घरेलू फैक्टरिंग देश के भीतर रिसीवेबल्स के वित्तीयन के लिए की जाती है और इसमें केवल एक फैक्टर शामिल होता है। दूसरे देशों के साथ हुए बिक्री संव्यवहार के लिए की गई फैक्टरिंग को अंतरराष्ट्रीय फैक्टरिंग कहते हैं। फैक्टरिंग ग्राहक की अवस्थिति के अनुसार इसे निर्यात अथवा आयात फैक्टरिंग भी कहते हैं। फैक्टर या तो संव्यवहार को प्रत्यक्ष रूप से संभालता है या संबंधित देश में किसी सहयोग साझेदार का इस्तेमाल करता है (दो फैक्टर व्यवस्था)। भारत में की जानेवाली 90% से अधिक फैक्टरिंग घरेलू संव्यवहारों से संबंधित है। भारत में अंतरराष्ट्रीय फैक्टरिंग में प्रमुख रूप से निर्यात फैक्टरिंग है जिसका आयात में बहुत ही कम योगदान है। भारत की फैक्टर कंपनियों में ईसीजीसी प्रमुख रूप से निर्यात फैक्टरिंग से जुड़ी है, जबकि अन्य कंपनियों में से ज्यादातर में घरेलू फैक्टरिंग का हिस्सा अंतरराष्ट्रीय फैक्टरिंग की तुलना में काफी अधिक है।


रिकोर्स के साथ और रिकोर्स के बिना फैक्टरिंग

फैक्टरिंग व्यवस्था रिकोर्स सहित और बिना रिकोर्स के हो सकती है। रिकोर्स सहित फैक्टरिंग के मामले में, यदि उधारकर्ता परिपक्वता पर रकम अदायगी नहीं करता तो फैक्टर को विक्रेता पर विधिक कार्रवाई का हक रहता है। इस प्रकार फैक्टर बिलों की वसूली के लिए किसी एजेंट के तौर पर काम करता है और उधार अथवा तत्संबंधी ब्याज चुकाने में ग्राहक की असफलता के जोखिम को कवर नहीं करता। इसके विपरीत रिकोर्स-रहित फैक्टरिंग में चूक की स्थिति में फैक्टर को विक्रेता के विरुद्ध रिकोर्स की सुविधा उपलब्ध नहीं होती और चुकौती में क्रेता की असफलता की स्थिति में वह उधार का जोखिम वहन करता है। किन्तु माल की गुणवत्ता और आपूर्ति के संबंध में क्रेता और  विक्रेता के बीच व्यापारिक विवाद की स्थिति में रिकोर्स-रहित फैक्टरिंग के मामले में आम तौर पर एक सीमित रिकोर्स रहता है।

प्रकटीकृत एवं अप्रकटीकृत फैक्टरिंग


प्रकटीकृत फैक्टरिंग के अंतर्गत उधार को फैक्टर को सौंपने की जानकारी उधारकर्ता को दी जाती है, और तदनुसार  उधारकर्ता से अपेक्षा की जाती है कि वह भविष्य के लेनदेन व वसूली के मामले में फैक्टर से सहयोग करे। विकल्पतः अप्रकटीकृत फैक्टरिंग के अंतर्गत विक्रेता और फैक्टर के बीच हुए करार की जानकारी उधारकर्ता को नहीं दी जाती। इस स्थिति में उधारकर्ता सीधे विक्रेता के खाते में भुगतान करता है और उधारी वसूली की प्रक्रिया में फैक्टर सीधे शामिल नहीं होता। भारत में की जानेवाली अधिकतर फैक्टरिंग प्रकटीकृत होती है, जो वैश्विक रूप में भी आम तरीका है। प्रकटीकृत फैकटरिंग के अंतर्गत फैक्टर अपने ग्राहक के सभी उधारकर्ताओं को असाइनमेंट का नोटिस भेजता है और केवल उन उधारकर्ताओं के संबंध में फैक्टरिंग की जाती है जो असाइनमेंट को सकारते हैं। दूसरी और अप्रकटीकृत फैक्टरिंग में फैक्टरिंग एक सीमा तक ही प्रदान की जाती है और क्योंकि उसमें अधिक जोखिम रहता है और ग्राहक के संबंध में भी सम्यक श्रम आवश्यक होता है।

प्रमुख प्रदाता


भारत में अब भी फैक्टरिंग के सेवा-प्रदाताओं की संख्या सीमित है। वर्तमान में फैक्टरिंग की ज्यादातर सेवा देने वाले निम्नवत हैः 

  • विशेषज्ञ फैक्टर संस्थाएं

एसबीआई ग्लोबल फैक्टर्सSBI Global Factors
कैनबैंक फैक्टर्सCanbank Factors
आईएफसीआई फैक्टर्सIFCI Factors

  • वाणिज्य बैंक

एचएसबीसीHSBC
आईसीआईसीआई बैंक ICICI Bank
ऐक्सिस बैंकAxis Bank

  • विशेषज्ञ वित्तीय संस्थाएं

ईसीजीसीECGC

फैक्टरिंग की कार्यपद्धति के बारे में जानने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें

 

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