विनिमय दर जोखिम का समाधान

अपने व्यवसाय के दौरान एमएसएमई को कई तरह के जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे ब्याज दर जोखिम, विदेशी मुद्रा जोखिम और प्राकृतिक आपदाएँ। इनके कारण उनको वित्तीय हानि हो सकती है और लाभ घट सकता है। चूंकि एमएसएमई बड़ी फर्मों की तुलना में बहुत सीमित बजट से काम चलाते हैं, और उनका पूँजी आधार बहुत कमजोर होता है, इसलिए विभिन्न प्रकार के जोखिमों से होनेवाली हानियों का एमएसएमई के लाभ और परिचालन क्षमताओं पर बड़ी फर्मों की अपेक्षा बहुत घातक असर हो सकता है।

खासकर विदेशी मुद्रा-जोखिम का निर्यात, आयात और विदेशी मुद्रा में उधार लेनेवाली फर्मों पर अधिक असर पड़ता है।  रुपये की मूल्य-वृद्धि से आयातकों को लाभ होता है, क्योंकि इसके कारण आयातित माल का रुपयों में दाम घट जाता है और इससे निर्यातकों को नुकसान होता है क्योंकि इससे निर्यात किए जानेवाले माल का विदेशी मुद्रा में दाम बढ़ जाता है। रुपये की कीमत में गिरावट से ऐसे उधारकर्ताओं को हानि होती है जो ऐसी विदेशी मुद्राओं में उधार लेते हैं जो भारतीय ऋणों से सस्ती हैं।

क्योंकि मुद्रा में उतार-चढ़ाव से एमएसएमई पर बुरा असर पड़ता है, इसलिए उनको विभिन्न मुद्राओं के समक्ष अपने जोखिम एक्स्पोजर का निर्धारण करना चाहिए। साथ ही, जोखिम कम करने की रणनीतियाँ और तरीके अपनाने चाहिए।

जोखिम एक्स्पोजर के निर्धारण के लिए निम्नलिखित की पहचान करना होता है:

  • मुद्रा जिससे फर्म एक्स्पोज्ड है।
  • विदेशी मुद्रा में बिक्री /खरीद/प्राप्य / देय राशि की मात्रा
  • किसी सीमा तक मूल्य उतार-चढ़ाव ग्राहक को (दाम बढ़ाकर या मूल्य-उतार-चढ़ाव खंड का प्रावधान करके) अंतरित किया जा सकता है?
  • फर्म की समग्र लाभप्रदता पर मुद्रा के उतार-चढ़ाव का प्रभाव।

जोखिम से निपटने की रणनीति के निर्धारण में इस बात का मूल्यांकन करना होता है कि क्या फर्म को विदेशी मुद्रा जोखिम से हेज करना भी चाहिए या नहीं। और यदि करना चाहिए तो किस हद तक।

जब फर्म का विदेश मुद्रा में सीमित एक्सपोजर हो तो यह देखकर चुनिंदा आधार पर हेजिंग करनी चाहिए, कि क्या मुद्रा की स्थिति अनुकूल हो सकती है जिससे फर्म परिस्थिति का लाभ लेना चाहती है और इसलिए उसे पूरी तरह हेज करने की जरूरत नहीं है।

  • फर्म के किसी विदेशी मुद्रा परिस्थिति में जाने पर व्यवस्थित हेजिंग की जा सकती है।

जोखिम समाधान के साधनों और तरीकों में मुद्रा आधार के विविधीकरण के साथ-साथ अगाऊ संविदाएं, अदला-बदली, कॉल और पुट विकल्पों की खरीद तथा मुद्रा वादा के इस्तेमाल के ज़रिए मुद्रा एक्स्पोजर की हेजिंग करना शामिल है।

मुद्राओं के मध्य जोखिम का विविधीकरण लाभकारी होता है, क्योंकि अलग-अलग मुद्राएं अलग-अलग तरीके से चलती हैं, और एक मुद्रा में एक्स्पोजर से हुई हानि के कारण दूसरी किसी मुद्रा में एक्सपोजर से लाभ हो सकता है।

2.  साथ ही, काउन्टर पर और विनिमय-गृहों में बेची-खरीदी गई विभिन्न हेजिंग साधन मुद्रा के जोखिम की हेजिंग के लिए उपलब्ध होते हैं:

  • विदेशी मुद्रा वायदा संविदा से किसी पूर्व-सहमत तारीख के ले कोई पूर्व-सहमत विनिमय दर लॉक करना संभव हो पाता है
  • विदेशी मुद्रा विकल्प संविदाएं संविदा के क्रेता को भविष्य की किसी तारीख में विदेशी मुद्रा लेन-देन करने का अधिकार प्रदान करती हैं किन्तु दायित्व नहीं।
  • मुद्रा फ्यूचर विनिमय के जरिए बेचे-खरीदे जानेवाले उत्पाद हैं और वे अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शिता व लचीलापन प्रदान करते हैं किन्तु विदेशी मुद्रा एक्सपोजर को हेज करने के लिए कोई कस्टमाइजेशन नहीं।

निर्यात के लिए हेजिंग साधन का चयन उपलब्धता, लचीलेपन और लागत पर निर्भर करता है। भारत में सबसे आम हेजिंग साधन हैं वादा संविदाएं जो ज्यादातर बैंक प्रदान करते हैं।

मुद्रा जोखिम एक्सपोजर की हेजिंग में जोखिम प्रबंध रणनीतियाँ विकसित करना और ठीक समय पर हेजिंग निर्णय करना शामिल है। हर रोज स्कैन रिपोर्टें तैयार करना और जिन मुद्राओं में फर्म का एक्सपोजर हो उनकी प्रवृत्तियों तथा विनिमय दरों को प्रभावित करने वाले घटकों का विश्लेषण करते रहने से सोच-समझकर हेजिंग का निर्णय करने में मदद मिलती है। किसी मुद्रा की माँग/ आपूर्ति और इस प्रकार उसके मूल्य पर प्रभाव डालनेवाले घटकों में निम्नलिखित समाहित हैं

  • समष्टि आर्थिक वातावरण और संकेतक जैसे- जीडीपी, सीपीआई, औद्योगिक उत्पादन, अंतरराष्ट्रीय व्यापार आदि।
  • स्टॉक मार्केट और देश की ईक्विटी की माँग
  • राजनीतिक स्थिरता और संगत देश की राजकोषीय नीतियां
  • देशों के ब्याज-दर का अंतर
  • क्रय-शक्ति समानता

हेजिंग का निर्णय समय पर लेने और बेहतर विनिमय दरें हासिल करने के लिए एमएसएमई फर्मों को बाजार व ब्याज दर पर प्रभाव डालनेवाले घटकों का अध्ययन करने और समझने की जरूरत होती है।

विदेशी मुद्रा डिरावेटिव्स और उपभोक्ता वस्तु मूल्य जोखिम तथा विदेशी ढुलाई जोखिम के संबंध में भारतीय रिज़र्व बैंक के दिशा-निर्देशानुसार भारत के एसएमई को अनुमति है कि वे विदेशी मुद्रा जोखि में अपने प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष एक्सपोजर की हेजिंग के लिए तत्संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत किए बिना वादा विदेशी मुद्रा संविदाएं बुक करें। भारतीय रिज़र्व बैंक के विस्तृत दिशानिर्देशों को देखने के लिए यहाँ क्लिक करें Click here। एसएमई बिना अंडरलाइंग एक्सपोजर अथवा आयात या निर्यात के बिना किसी पूर्ववर्ती रिकॉर्ड के वादा संविदाएं बुक कर सकते हैं और उनको संविदाएँ निरस्त करने और दुबारा बुक करने की भी अनुमति है।

यह घोषणा भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा अपनी वार्षिक नीति 2007-08 में की गई, जिसके ब्यौरे निम्नवत हैः

विदेशी मुद्रा जोखिम में प्रत्यक्ष और/अथवा अप्रत्यक्ष एक्सपोजर वाले एसएमई अपने एक्सपोजर के प्रभावपूर्ण तरीके से प्रबंधन के लिए रोल ओवर वादा संविदाएं बुक/निरस्त/ रीबुक कर सकते हैं।

  • ऐसी संविदाएं एडी वर्ग-I बैंकों के माध्यम से बुक की जा सकती हैं, जिनसे एसएमई को ऋण सुविधा प्राप्त है और /अथवा जिनसे उनका बैंकिंग संबंध है, और बुक की गई समस्त वादा संविदाओं को उनके द्वारा अपनी विदेशी मुद्रा आवश्यकताओं के लिए इस्तेमाल की गई ऋण सुविधाओं अथवा उनकी कार्यशील पूँजी अथवा पूँजी व्यय के अनुरूप बनाया जाना चाहिए। 
  • साथ ही, इस सुविधा का उपयोग कर रहे एसएमई को इस सुविधा के अंतर्गत अन्य एडी वर्ग-I बैंकों में पहले बुक की जा चुकी वादा संविदाओं की राशि (यदि कोई हो) के बारे में एडी वर्ग-I बैंक में एक घोषणा प्रस्तुत करनी चाहिए।
  • एसएमई को को अपने एक्सपोजर की हेजिंग के लिए विदेशी मुद्रा रुपया विकल्प के इस्तेमाल की अनुमति भी है।

स्रोत: भारतीय रिज़र्व बैंक तथा भारतीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम संघ (फिस्मे)

पढ़ें- a FISME paper on mitigating exchange rate risk here

 

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