7. संस्था के बहिर्नियम बनाएं

संस्था के बहिर्नियम वह उद्देश्य हैं, जिनके लिए संस्था गठित की गई है। कोई कंपनी विधिक रूप से ऐसा कोई काम करने के लिए अधिकृत नहीं है जो इस खंड में बताए गए उद्देश्यों में शामिल नहीं है। कंपनी के पंजीकरण के लिए विधिवत लिखा गया,सत्यापित, स्टांपित और हस्ताक्षरित –संस्था के बहिर्नियम- का होना जरूरी है।

संस्था के बहिर्नियम के निम्नलिखित हिस्से होते हैः

1.मुख्य उद्देश्य

चाहे उसे उप-खंड में सुस्पष्ट रूप में कहा न गया हो, किन्तु मुख्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए जो कार्य जरूरी हो या उसके संदर्भ में प्रासंगिक हो, वह करना कंपनी के लिए वैध है।

2.अन्य उद्देश्य

ऐसे उद्देश्य जो मुख्य उद्देश्य में उल्लिखित न हों, उनका यहाँ उल्लेख किया जा सकता है। किन्तु यदि कोई कंपनी ऐसा व्यवसाय करना चाहती है जो इस उप खंड में शामिल हो तो उसे या तो विशेष संकल्प पारित होगा या एक सामान्य संकल्प पारित करके उसके लिए केन्द्र सरकार का अनुमोदन लेना होगा।

3.पंजीकृत कार्यालय खंड

कंपनी जिस राज्य में और जिस पते पर अवस्थित है उसका नाम-पता बताएँ। इस चरण में पंजीकृत कार्यालय का सही-सही पता देना आवश्यक नहीं है, किन्तु कंपनी के पंजीकरण के तीस दिन के भीतर वह रजिस्ट्रार के यहाँ पंजीकृत हो जाना चाहिए।

4.पूँजी खंड

अधिकतम पूँजी और शेयरों की संख्या में उसके विभाजन को विनिर्दिष्ट करना, जो कंपनी शेयरों के निर्गम के ज़रिए जुटाने के लिए अधिकृत होगी।

5.बहिर्मियम खंड

संस्था के बहिर्नियम के हस्ताक्षरकर्ता कंपनी से संबद्ध रहने का अपना इरादा व्यक्त करते हैं और शेयर खरीदने के संबंध में अपनी सहमति देते हैं।

 संस्था के बहिर्नियम किसी वकील अथवा चार्टर्ड अकाउंटेंट के मार्गदर्खशन में आसानी से तैयार किए जा सकते हैं। संस्था के बहिर्नियम के बारे में और अधिक जानकारी  क) कंपनी अधिनियम, 1956 तथा ख) भारतीय विधिक सेवा से ली जा सकती है।