सीमित दायित्‍व भागीदारी (एलएलपी) – विधिक पहलू

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एलएलपी का एक मुख्‍य पहलू है कि इसके लिए लाभ का उद्देश्‍य होना आवश्‍यक है । इस प्रकार यह दानार्थ संगठनों हेतु उपलब्‍ध नहीं है । 

एलएलपी की मूलभूत विशेषताएं

संयुक्‍त संरचना

भागीदारी एवं कंपनी का समन्‍वय है । असीमित दायित्‍व की कमियों एवं कंपनी कानून के प्रावधानों की कठोरता को दूर करता है ।  

सीमित दायित्‍व, शाश्‍वत संरचना

स्‍वामित्‍व को पृथक करना सुनिश्चित करता है, इससे दायित्‍व फर्म तक सीमित रहता है और भागीदारों पर लागू नहीं होता ।  

परिचालनों में लचीलापन

आंतरिक प्रबंधन, भागीदारों को पारिश्रमिक, प्रबंध शक्ति व कुछ भागीदारों को वीटो शक्ति जैसी विशिष्‍ट शक्तियों के संबंध में अधिकतम लचीलापन है । ये अपने नाम पर संपत्ति भी रख सकती है ।

 एलएलपी में भागीदार

  1. एक भागीदार अन्‍य भागीदारों के लिए बाध्‍यकारी नहीं हो सकता । 
  2. कौन भागीदार हो सकता है ? एक कंपनी, एलएलपी, विदेशी एलएलपी एवं विदेशी कंपनी एलएलपी के भागीदार हो सकते हैं [तथापि, फेमा प्रावधानों में कोई संशोधन होने तक, लाभों या पूंजी के प्रत्‍यावर्तन में समस्‍याएं होंगी].
  3. न्‍यूनतम दो भागीदार होने चाहिए, कोई अधिकतम संख्‍या नहीं है । 
  4. भागीदारियों पर कोई प्रतिबंध नहीं – एक व्‍यक्ति कितनी भी एलएलपी में भागीदार बन सकता है ।
  5. पदनामित भागीदार – न्‍यूनतम दो भागीदारों को ‘पदनामित भागीदार’ के रूप में नामित किए जाने चाहिए, जो एलएलपी अधिनियम के अंतर्गत सांविधिक दायित्‍वों को पूर्ण कर सकें । अन्‍य भागीदारों को, सिवाय धोखाधड़ी के मामले के, सामान्‍यत: उत्‍तरदाई नहीं ठहराया जाएगा।
  6. एलएलपी करार
  1. करार की आवश्‍यकता  – एलएलपी अधिनियम, 2008 में काफी परिचालनगत लचीलापन है । तकनीकी रूप से, एलएलपी करार अनिवार्य नहीं है । कोई एलएलपी करार न होने की स्थिति में, एलएलपी की प्र‍थम अनुसूची में दिए गए प्रावधान स्‍वत: लागू होंगे । व्‍यवहार्यत:, प्रथम अनुसूची के प्रावधान अधिकतम स्थितियों में स्‍वीकार्य नहीं होते हैं । अत: प्रत्‍येक एलएलपी में एलएलपी करार होना अपेक्षित हो जाता है । एलएलपी का एक मानक प्रारूप होना न तो संभव है और न ही ऐसी सलाह दी जाती है । प्रस्‍तावित एलएलपी की जरूरतों व संरचना को ध्‍यान में रखते हुए एलएलपी करार का प्रारूप तैयार किया जाना चाहिए ।
  2. करार का निष्‍पादन – करार का निष्‍पादन एलएलपी के निगमन के पहले अथवा बाद में किया जा सकता है । चूंकि यह भागीदारों के बीच एक करार है, अत: इसके निष्‍पादन के संबंध में कुछ लचीलापन है । यह करार कितनी भी बार संशोधित भी किया जा सकता है ।  
     
  3. स्‍टांप ड्यूटी का ई भुगतान – कंपनी अधिनियम के अंतर्गत स्‍टांप ड्यूटी के ईभुगतान के प्रावधान किए गए हैं । जब तक एलएलपी अधिनियम के अंतर्गत इसके समानांतर प्रावधान नहीं बनाए जाते, तब तक भौतिक स्‍टांप एवं दस्‍तावेजों का भौतिक प्रस्‍तुतीकरण जारी रहेगा । 

एलएलपी करार पर सामान्‍य टिप्‍पणियां

  • करार को सावधानीपूर्वक तैयार करना – ऐसा कोई मानक एलएलपी करार नहीं हो सकता है, जो सभी प्रकार की एलएलपी की जरूरतों हेतु उपयुक्‍त हो । अत: ये अद्वितीय होता है । उदाहरण के लिए, कुछ एलएलपी परिवार भागीदारियों के रूप में तो कुछ संयुक्‍त उद्यमों के रूप में हो सकते हैं । 
  • करार को यथासंभव लचीला होना चाहिए । यह करार जितना कठोर होगा, उतना ही अधिक परिचालनगत समस्‍याएं होंगी । सभी पक्षों की जरूरतों को ध्‍यान में रखा जाना चाहिए । 
  • भागीदारों के प्रकार – भारतीय भागीदारी अधिनियम के अनुसार, भागीदार किसी फर्म में परस्‍पर एजेंट होते हैं । तथापि, एलएलपी अधिनियम के अंतर्गत, भागीदारों का प्राधिकार एलएलपी करार के माध्‍यम से सीमित किया जा सकता है । 
  • वीटो शक्ति – करार में एक या अधिक भागीदारों को वीटो शक्ति के प्रावधान होने चाहिए । यदि आप एलएलपी के एक भागीदार के रूप में निर्णय प्रक्रिया को नियंत्रित करना चाहते हों, तो यह उपयोगी होगा ।   
  • कार्यपालक /प्रबंध समिति – भागीदारों की बड़ी संख्‍या के मामले में, बेहतर होगा कि प्रबंधन के संचालन हेतु वरिष्‍ठ भागीदारों की एक समिति बनाई जाए । 
  • भागीदारों की संख्‍या – एलएलपी करार निष्‍पादित करने हेतु न्‍यूनतम कानूनी आवश्‍यकता 2 भागीदारों की है । तथापि, यदि भागीदारों की संख्‍या अधिक हो, तो बेहतर होगा कि कंपनी का निगमन 2 भागीदारों के साथ किया जाए तथा बाद में अन्‍य भागीदारों को शामिल किया जाए ।     
  • फार्म 3 के अनुरूप एलएलपी करार बनाना – फार्म 3 के स्‍तंभ 7 से 20 तक, एलएलपी करार संबंधी सूचना के बारे में होते हैं । बेहतर होगा कि यदि एलएलपी करार को यथासंभव इसी अनुसार बनाया जाए, जिससे फार्म 3 प्रस्‍तुत करने और कंपनी रजिस्‍ट्रार द्वारा इसकी जांच करने में सुविधा होगी । 

एलएलपी को आरंभ करने हेतु कदम 

  1. एक डी पिन (पदनामित भागीदार पहचान संख्‍या)प्राप्‍त करें. इसके आवेदन हेतु फार्म 7 का उपयोग करें और बाद में फार्म की भौतिक प्रति भेजें ।    
  2. डिजिटल हस्‍ताक्षर – पदनामित भागीदारों को किसी प्रमाणन एजेंसी (सीए) से, श्रेणी II या इससे ऊपर का एक डिजिटल हस्‍ताक्षर प्रमाणपत्र (डीएससी) प्राप्‍त करना चाहिए ।
  3. एलएलपी वेबसाइट पर डी पिन एवं डीएससी को रजिस्‍टर करें ।   
  4. भागीदारों के बारे में सूचना प्रस्‍तुत करना  - फार्म 3 (एलएलपी करार की सूचना) एवं फार्म 4 (भागीदार/पदनामित भागीदार की नियुक्ति की सूचना). ये फार्म फार्म 2 के साथ ही अथवा निगमन के 30 दिनों के भीतर जमा किए जा सकते हैं ।   
  5. एलएलपी करार की विधिवत स्‍टांपयुक्‍त एक मूल प्रति भेजें ।  

एलएलपी को चलाना 

  • गठन – एलएलपी के निगमन की प्रक्रियाएं, कंपनी के निगमन के समान हैं । निगमन दस्‍तावेज (ज्ञापन के समान) और एलएलपी करार (संस्‍था के अंतर्नियमों के समान) इलेक्‍ट्रानिक रूप से फाइल किया जाना अपेक्षित होता है ।   
  • औपचारिकताएं - एलएलपी  चलाने हेतु अत्‍यंत कम औपचारिकताएं हैं । उदाहरण हैं – बोर्ड बैठकों, सामान्‍य बैठकों, प्रभारों के पंजीकरण, प्रबंधस्‍तरीय पारिश्रमिक की सीमाएं, शेयरों के जारी करने व अंतरण, निदेशकों के चयन, बोर्ड की शक्तियों पर प्रतिबंध आदि जैसी कोई औपचारिकताएं नहीं हैं ।   
  • लेखे और रिटर्नों की ई फाइलिंग – लेखों का संधारण आवश्‍यक है, किंतु एलएलपी  लेखापरीक्षण प्रावधानों से मुक्‍त है । इलेक्‍ट्रानिक रूप से रिटर्न फाइल करते समय लेखा व शोधन क्षमता की विवरणी अपेक्षित है । यह अर्हता के अधीन है, जो पण्‍यावर्त एवं योगदान पर आधारित है ।   
  • भागीदारों/ होल्डिंग आउट में परिवर्तन -  कानूनन भागीदारों में बदलाव के 30दिनों के भीतर अधिसूचना आवश्‍यक है ।  ‘होल्डिंग आउट’ का प्रावधान भी रखा गया है (यदि कोई गैर भागीदार ऐसा संकेत देता है कि वह फर्म में किसी बाहरी के लिए भागीदार है, तो ऐसा गैर भागीदार भी भागीदार के समा‍न ही उत्‍तरदायी ठहराया जाएगा ।     
  • पुनर्गठन/समामेलन – पुनर्गठन, समामेलन व समझौतों, समापन, निरीक्षण एवं जांच के प्रावधान कंपनी अधिनियम के समान ही हैं ।      
  • मौजूदा कंपनी/फर्मों का रूपांतरण- मौजूदा कंपनियां, निजी व गैरसूचीकृत कंपनियां, एलएलपी में रूपांतरित हो सकती है, बशर्ते :
    • यदि आयकर अधिनियम की धारा 47(xiib) में दी गई शर्तें पूर्ण होती हों, तो ऐसे रुपांतरण से कंपनी या इसके शेयरधारकों को कोई पूंजीगत लाभ नहीं होंगे । 
    • केवल ऐसी छोटी कंपनियां रूपांतरित हो सकती हैं, जिनका पण्‍यावर्त 60 लाख से कम हो ।   
  • एलएलपी का कराधान -  एलएलपी का कराधान, एक भागीदारी के समान ही होगा । अपवाद यह है कि किसी भागीदारी फर्म का भागीदार फर्म के आयकर दायित्‍वों हेतु वैयक्तिक तौर से उत्‍तरदाई होगी। एलएलपी के मामले में, सभी भागीदार संयुक्‍त रूप से और अलग अलग आयकर दायित्‍वों हेतु उत्‍तरददायी हैं, किंतु कोई भागीदार इस उत्‍तरदायित्‍व से बच सकता है यदि वह ऐसा साबित कर सके कि गैर वसूली, उसकी ओर से किसी गंभीर लापरवाही या कर्त्‍तव्‍य की अवहेलना के कारण नहीं हुई है ।

एलएलपी हेतु अपेक्षित विवरणियां एवं अभिलेख  

  • खातों की बहियां 
  • कार्यवृत्‍त पुस्तिका –भागीदारों के साथ एवं भागीदारों की प्रबंध/कार्यपालक समिति के साथ हुई बैठकों के कार्यवृत्‍त दर्ज करने हेतु । 
  • भागीदारों में परिवर्तन – भागीदार/पदनामित भागीदार में हुए किसी भी परिवर्तन को ऐसे बदलाव के
  • 30 दिनों के भीतर ईफार्म 3 का उपयोग  करते हुए इलेक्‍ट्रानिक रूप से फाइल किया जाना चाहिए । 
  • पूरक एलएलपी करार – ऐसे स्‍वीकरण एवं समाप्ति भागीदारों के परस्‍पर अधिकारों एवं कर्तव्‍यों को बदल देंगी । अत: पूरक एलएलपी करार आवश्‍यक होगा, जिसे परिवर्तन के 30 दिनों के भीतर ई फार्म 3 में सशुल्‍क भरा जाना होगा  (इससे बचने हेतु एलएलपी करार उपयुक्‍त रूप से तैयार किया जा सकता है) ।  
  • लेखा एवं शोधन क्षमता की विवरणी –  यह विवरण प्रतिवर्ष ईफार्म 8 में (शुल्‍क सहित) भरी जारी होती है । इसे प्रति वित्‍त वर्ष की समाप्ति के 6 माह के भीतर अर्थात 30 अक्‍टूबर तक भरा जाना चाहिए । 
  • वार्षिक रिटर्न  – यह वित्‍त वर्ष की समाप्ति के 60 दिनों के भीतर कंप‍नी रजिस्‍ट्रार को ईफार्म 11 में भरा जाना चाहिए । इस रिटर्न में हुए विलंब पर प्रतिदिन 100 रुपए की दर से दंड लगता है ।   

दस्‍तावेजों का निरीक्षण  – निगमन दस्‍तावेज (फार्म 2), वार्षिक रिटर्न (फार्म11), एसएएस (फार्म 8) एवं भागीदारों के नाम व कोई बदलाव (फार्म 3) जनता के निरीक्षण हेतु सशुल्‍क उपलब्‍ध कराए जाते हैं । तथापि, एलएलपी करार, जनता के निरीक्षण हेतु उपलब्‍ध नहीं होता है ।

सूचना  http://www.dateyvs.com/limited_liability_partnership.htm से एकत्र की गई है ।