वस्त्र एवं परिधान

Textiles & Apparels

 

 

 वस्त्र एवं  परिधान उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।  2.5 लाख  करोड़ रुपये वाले इस उद्योग क्षेत्र की औद्योगिक उत्पादन में 14%, सकल घरेलू उत्पाद में 4%, कुल निर्यात आमदनी में 17% की भागीदारी  है और कृषि क्षेत्र के बाद यह रोजगार प्रदान करने वाला दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र है।  वस्त्र एवं परिधान उद्योग 350 लाख लोगों से भी अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है। विश्व के कोटन यार्न व्यापार में भारत के वस्त्र उद्योग की लगभग 25% भागीदारी  है।  2.5 लाख  करोड़ रुपये वाले इस उद्योग क्षेत्र  से 64% घरेलू मांगों तथा 36% निर्यात मांगों की पूर्ति होती है।  इसके अंतर्गत वर्ष 2008-09 के दौरान 96200 करोड़ रुपये का  कुल निर्यात हुआ।  

 

भारत में वस्त्र उद्योग विभाजित और विविधिकृत है।  इसमें एक ओर जहाँ हस्त कताई वाला क्षेत्र है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक तकनीक वाला मिल क्षेत्र है।  इस क्षेत्र में लघु उद्योगों का वर्चस्व है।  इन उद्योगों को मुख्यतः संगठित/मानव निर्मित सूत मिल, मानव निर्मित फाइबर/यार्न क्षेत्र, ऊन और ऊन से बने वस्त्र, रेशम-कीड़ा पालन और रेशम से निर्मित वस्त्र, हथकरघे, हस्त शिल्प, जूट एवं जूट निर्मित उत्पाद और वस्त्र निर्यात इकाइयों के रूप में विभाजित किया जा सकता है। विकेद्रीकृत बिजलीचालित करघे और बुनाई वस्त्र उद्योग का सबसे बडा हिस्सा है। 

 

भारत में  कच्चा माल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, जिससे यह देश वस्त्र उद्योग क्षेत्र में लाभप्रद स्थिति में है।   भारत जूट का उत्पादन करने वाला सबसे बड़ा देश है।  कोटन एवं रेशम  का उत्पादन करने में यह दूसरा नम्बर पर आता है और सिंथेटिक फाइबर का उत्पादन करने में इसका स्थान चौथा है।  विश्व में टैक्सटाइल फाइबर और यार्न(जूट सहित) के उत्पादन में भारत का योगदान लगभग 12% है।  यहाँ कुशल और अकुशल श्रमिक भी कम लागत पर आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।   घरेलू मांगों के तेजी से बढ़ने,  संगठित खुदरा क्षेत्र में वृद्धि होने और अधिक क्रय क्षमता के फलस्वरूप भारत के वस्त्र उद्योग क्षेत्र में विकास की पर्याप्त संभावनाएँ हैं।  टॉमी हिल्फिगर, जीएपी, बेनिटन, लिवाइस जैसे शीर्षस्थ अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों और मार्क्स एंड स्पेंसर और वाल-मार्ट और टेसको जैसे खुदरा ब्रांडों  के लिए भारत उदगम केद्र  भी है। 

 

भारत को अपने उत्पादन की मात्रा और प्रौद्योगिकीय परिवेश में सुधार करने की आवश्यकता है।  इसमें मदद करने के लिए सरकार ने कई प्रकार के नीतिगत निर्णय किए हैं। प्रौद्योगिकी उन्नयन निधि योजना (टफ्स) तथा पूँजी आधारित सब्सिडी योजना(सीएलएसएच) इसी उद्देश्य की पूर्ति हो रही है। सरकार ने  प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों  को वस्त्र एवं परिधान उद्योग क्षेत्र में  शत-प्रतिशत निवेश करने की मंजूरी दे दी है और इसके लिए किसी भी प्रकार की पूर्वानुमति की आवश्यकता नहीं है।   सरकार  ने समेकित टैक्सटाइल पार्कों (आईटीपी) की संकल्पना भी आरंभ की है।  वस्त्र मंत्रालय  14700 कराड़ रुपये तक के निवेश के साथ 30 समेकित टेक्सटाइल पार्कों की स्थापना करने की योजना बना रहा है।  राष्ट्रीय फाइबर नीति का मसौदा भी तैयार हो चुका है, जिससे फाइबर नियमित रूप से उपलब्ध हो सकेगा।

 

भारत में फाइबर की प्रति व्यक्ति खपत 3 किलोग्राम  है।  विश्व के औसतन 9 किलोगाम प्रति व्यक्ति खपत से यदि इसकी  तुलना की जाए, तो यह मात्र उसका तीसरा हिस्सा ही है।  इससे ज्ञात होता है कि भारत में इस क्षेत्र में अपार संभावनाएँ हैं।  भारत में लागत और कच्चे माल की सुखद स्थिति टैक्सटाइल क्षेत्र में निवेश करने के लिए निवेशकों को आकर्षिक करती है।   कामकाजी महिलाओं की बढ़ती संख्या, क्रेडिट कार्ड का बढ़ता उपयोग और सस्ती  दरों पर  वित्त-उपलब्धता,   कोटे का समाप्त होना और संगठित खुदरा क्षेत्र में तेजी से बढ़ती मांग ही भावी विकास के प्रमुख कारक  होंगे। विकास के इन  अवसरों के बल पर यह अपेक्षा की जा सकती है कि इस उद्योग में वर्ष 2012 तक 5.5 लाख करोड़ रुपये तक की वृद्धि होगी और इसका निर्यात भी 2.3 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ सकेगा।  

 

आंकड़ों का स्रोत : वित्त मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2009-10 एनसीएईआर, आईसीआरआईईआर, एनएमसीसी।

Relevant Reports

Resources: 

Support Organisations
Export Promotion Councils

Government Bodies

Industry Association/bodies

Training and Research Institutes

Best Practices