औषधिनिर्माण

Pharmaceuticals

भारत में औषधिनिर्माण उद्योग में कुल  59700 कऱोड़  रुपये का कारोबार होता है।  यह क्षेत्र अति विभाजित है,  जिसे  बहुराष्ट्रीय कम्पनियों(एमएनसी) और भारतीय विनिर्माताओं के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।  भारत में जनरिक औषाधि-निर्माण करने वाली लघु एवं मध्यम आकार की 3000 से भी अधिक इकाइयाँ हैं।   भारतीय कम्पनियाँ जनरिक एवं बल्क दवाइयाँ बनाने में पारंपरिक रूप से सुद्दृढ़ हैं  और इनका बाजार मध्यम एवं निचले स्तर के ग्राहकों के लिए है।  बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का ध्यान ज्यादातर उच्च स्तर के ग्राहक बाजारों पर केद्रित होता है।  भारत की अपनी चिकित्त्सा पद्धति भी है, जिसके अंतर्गत 7000 से भी अधिक इकाइयाँ आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथिक दवाइयाँ  बनाती हैं।

 

 भारत के औषधि-निर्माण उद्योग ने विश्व मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज की है।   विश्व में कुल औषधि उत्पादन की मात्रा का 8% और उसके कुल मूल्य के 2% का योगदान भारत की ओर से होता है।  औषधि-निर्माण के कुल उत्पादन में  हिस्सेदारी की दृष्टि से भारत का औषधि-निर्माण उद्योग विश्व में चौथे स्थान पर है।  इस उद्योग से 27600 करोड़ रुपये का निर्यात होता है और उसके मूल्य की दृष्टि से विश्व में भारत का 17वां स्थान  है।  भारतीय औषधि-निर्माण उद्योग विश्व के जनरिक औषधि बाजार में 22% का योगदान करता है।

 

नीतिगत स्तर पर,  प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों को 100% तक निवेश करने के लिए अनुमत किया गया है और इसके लिए किसी प्रकार की पूर्वानुमति की आवश्यकता नहीं है।  औषधिनिर्माण उद्योग को लाइसैंस मुक्त करने के निर्णय के अनुपालन में  अधिकतर दवाइयों और औषधियों के उत्पादनों हेतु औद्योगिक लाइसैंस की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है। औषधि विनिर्माताओं को अब यह छूट है कि वे औषधि नियत्रण प्राधिकरण के विधिवत अनुमोदन से किसी भी दवा का उत्पादन कर सकते हैं।  हाल ही में बने कानून के अंतर्गत विनिर्माता इकाइयों  के लिए यह अनिवार्यता हो गई है कि वे अपने उत्पादनों के संबंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और अन्तरराष्ट्रीय मानकों का अनुपालन करें।  इसके अंतर्गत उत्तम उत्पादन प्रणालियों (जीएमपी) का भी प्रावधान है, जिसमें  गुणवत्ता नियंत्रण संबंधी निर्देशों पर बल दिया जाता है।    

 

भारत उत्पादन के क्षेत्र में एक सशक्त देश है।  यहाँ वहनीय मूल्यों पर गुणवत्तापूर्ण दवाइयाँ बनती हैं और इसी कारण नियामक और गैर-नियामक बाजारों में भारत में बनी  औषधियाँ अच्छा व्यवसाय कर रही हैं।  उत्पादन लागत में कमी के कारण यह संभव हो सका है।  इसके अलावा,  अनुसंधान एवं विकास पर भी कम लागत आती है और श्रम-शक्ति पर भी कम खर्च होता है।  भारत में एक अनुसंधान वैज्ञानिक पर होने वाला खर्च मोटे तौर पर  अमेरिका के अनुसंधान वैज्ञानिक पर होने वाले खर्च के छठे हिस्से के बराबर होता है।

 

आगे देखें तो, भारतीय औषधिनिर्माण उद्योग में प्रतिवर्ष 24% की दर से वृद्धि होने और  वर्ष 2010 तक  1.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचने की संभावना है। पेटेंट की गई दवाइयों के विपणन की संभावनाओं, संविदा अनुसंधान और उतपादन क्षेत्र में बढ़ोतरी,  औषधिनिर्माण के खुदरा क्षेत्र और  नैदानिक/बाजार आंकड़ों के विश्लेषण सहित, सूचना प्रौद्योगिकी समर्थित सेवाओं में विस्तार के चलते यह संभव हो सकेगा।  आशा है कि नैदानिक परीक्षण से इसे ओर बल मिलेगा और वर्ष 2010 तक नैदानिक परीक्षण उद्योग बढ़कर 6900 करोड़ रुपये तक पहुँच जाएगा। अपने उत्पादन की लागत कम करने और अनुसंधान और विकास पर ज्यादा खर्च करने के लिए बहुत-सी कम्पनियाँ भारत में आमेलन एवं अभिग्रहण क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं, जिससे कि उन्हें  औषधिनिर्माण कार्य में संलग्न विश्व स्तर  की बड़ी कम्पनियों से प्रतिस्पर्द्धा करने में कठिनाई न हो सके।  

Data Sources: Investment Commission of India, Pharmaceuticals Export Promotion Council

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