इंजीनियरिंग

Engineering

 

लाइट इंजीनियरिंग क्षेत्र भारत के उस संपूर्ण इंजीनियरिंग उद्योग का हिस्सा है, जिसकी निर्मित वस्तुएँ भारी इंजीनियरिंग उद्योग निविष्टियों के रूप में करते हैं।   अतः इस क्षेत्र के मांग पूंजीगत वस्तु उद्योग की मांग पर निर्भर होती है।  

लाइट इंजीनियरिंग उद्योग   

लाइट इंजीनियरिंग क्षेत्र भारत के उस संपूर्ण इंजीनियरिंग उद्योग का हिस्सा है, जिसकी निर्मित वस्तुएँ भारी इंजीनियरिंग उद्योग निविष्टियों के रूप में करते हैं।   अतः इस क्षेत्र के मांग पूंजीगत वस्तु उद्योग की मांग पर निर्भर होती है।   इस क्षेत्र की इकाइयों में मध्यम एवं निचले  स्तर की प्रौद्योगिकी  इस्तेमाल की जाती है, जबकि भारी इंजीनियरिंग क्षेत्र में उच्च स्तर की  प्रौद्योगिकियाँ इस्तेमाल होती हैं।  इस क्षेत्र में कम निवेश के साथ कम उत्पादन क्षमता वाली इकाइयाँ आसानी से स्थापित की जा सकती हैं।  लाइट इंजीनियरिंग उद्योग में  कम लागत पर बेहतर उत्पाद निर्मित करने वाले लघु और असंगठित इकाइयों का वर्चस्व है। इस क्षेत्र में लघु उद्योंगों की संख्या अधिक होने के कारण  उनमें आपस में कड़ी प्रतिस्पर्द्धा रहती है। भारी इंजीनियरिंग वस्तुओं के लिए अंतिम उपयोगकर्ता उद्योगों में विद्युत, मूलभूत संरचना, स्टील, सीमेंट, पैट्रोरसायन, तेल एवं गैस, तेल शोधनशालाएँ, खदान, रेलवे, ऑटोमोबाइल और वस्त्र उद्योग आदि प्रमुख उद्योग हैं। लाइट इंजीनियरिंग उद्योग के अंतर्गत इस क्षेत्र के दो भिन्न समूह आते हैं, जिनमें पहला समूह  निचले स्तर की प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करके  कास्टिंग, फोर्जिंग और फास्नर्स जैसी मदों का निर्माण करने वाला होता है और दूसरा  अति परिष्कृत  माइक्रो प्रौसेसर आधारित प्रौसेस नियंत्रण उपकरण और नैदानिक चिकित्सा उपकरणों का निर्माण करने वाला क्षेत्र होता है।  लाइट इंजीनियरिंग उद्योग में विभिन्न उपक्षेत्र भी हैं, जिनका विवरण नीचे दिया गया हैः

बियरिंग उद्योग

बियरिंगों का इस्तेमाल मुख्यतः घूमने वाले पुर्जों में किया जाता है और ये  मशीन की कार्य क्षमता निर्धारित करने के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण होते हैं।  भारत का बियरिंग उद्योग अपनी सामान्य किस्म और आकार के बियरिंगों की मांग के लगभग 70% हिस्से की पूर्ति कर रहा है और इनकी शेष मांग की पूर्ति आयात के माध्यम से होती  है।  इस उद्योग ने अपने उत्पादों का विविधीकरण किया है और इसके अंतर्गत लगभग 500 किस्म के बियरिंग बनते हैं।  इस उद्योग में निर्मित उत्पादों  की कुल मांग में सबसे ज्यादा खपत ऑटोमोबाइल उद्योग में होती है। ऑटोमोबाइल क्षेत्र के बढ़ते उत्पादन को देखते हुए आने वाले वर्षों में बियरिंग की मांग  भी काफी बढ़ जाएगी।

चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा उपकरण

चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा उपकरण उद्योग स्वास्थ्य देखभाल वितरण प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।  आजकल स्वास्थ देखभाल भी   इलैक्ट्रॉनिक चिकित्सा उपकरणों पर निर्भर हो गई है और ये उपकरण चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े व्यावसायियों के लिए  मरीज की बीमारी का पता लगाने, थेरेपी करने, निगरानी और स्वास्थ की देखभाल के लिए अनिवार्य औजार बन गए हैं।  देशीय विनिर्माता आजकल इलैक्ट्रो कार्डियोग्रहाम(ईसीजी मशीन), एक्स-रे स्कैनर, सीटी स्कैनर, शार्टवेव फिजियोथेरेपी इकाई, इलैक्ट्रो शल्यचिकित्सा इकाइयाँ, बल्ड केमेस्ट्री एनालाइजर आदि जैसे अलग-अलग किस्म के इलैक्ट्रॉनिक चिकित्सा उपकरणों का निर्माण करने में सक्षम हो गए हैं।   

लोह ढलाई(फैरस कास्टिंग )

लोह ढलाई (फैरस कास्टिंग)  इंजीनियरिंग उद्योगों की संवृद्धि और विकास के लिए  अति  अनिवार्य होती हैं, क्योंकि इनका उपयोग ऑटोमोबाइल, औद्योगिक मशीनों, विद्य़त संयंत्रों, रसायनों एवं उर्वरकों, सीमेंट संयंत्रों आदि में आवश्यक मध्यवर्तियों के रूप में होता है।  यह उद्योग  अब देश में पूरी तरह से स्थापित हो चुका है।   बड़े सीमेंट संयंत्रों को छोड़कर अधिकतर उद्योगों में 5 किलो से 4 टन के बीच के वजन वाले उत्पादों में कास्टिंग की  आवश्यकता होती है।

प्रकिया नियंत्रण उपकरण

प्रकिया नियंत्रण उपकरण और प्रणालियों की आवश्यकता भौतिक, रसायन और जैविक गुणों की  निगरानी  और परिमापन के लिए पड़ती है।    ये उपकरण  प्रसंस्करण उद्योग में दबाव, तापमान, आर्द्रता स्तर, प्रवाह आदि के परिमाप और नियंत्रण संबंधी मानदंडों के लिए आवश्यक होते हैं।  उच्च लागत वाले बड़े और आधुनिक तकनीकयुक्त संशोधित उद्योगों में इनका व्यापक रूप से प्रयोग होता है।  इन उद्योगें में उर्वरक, स्टील संयत्रं, तेल शोधनशालाएँ, पैट्रो रसायन, सीमेंट और अन्य प्रसंस्करण उद्योग शामिल होते हैं।

जोड़ रहित(सीमलेस )स्टील पाइप और टय़ूबें  

जोड़ रहित (सीमलेस) स्टील पाइपों और टय़ूबों का इस्तेमाल हाइड्रोकार्बन उद्योगों, प्रसंस्करण और सामान्य इंजीनियरिंग उद्योगों में होता है।  टयूबों पर आवरण(केसिंग) का प्रयोग तेल एवं गैस के कुओं की खुदाई करते समय किया जाता है, जबकि बॉयलर पाइपों का इस्तेमाल बॉयलरों, हीट एक्सचेंजरों, सुपर हीटरों आदि में होता है।   ये  एलॉय स्टील तथा कार्बन स्टील  दोनों प्रकार की टय़ूबों वाले होते हैं।  सीमलेस पाइपों का उपयोग उन स्थानों पर किया जाता है, जहाँ मजबूती, जंग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता और उत्पाद का जीवन काल अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है।  सीमलेस पाइपों की कुल मांग की लगभग 60% खपत तेल क्षेत्र मे होती है, जबकि बियरिंग, ऑटोमोबाइल और बॉयलर क्षेत्र में लगभग 30% खपत होती है।

जोड़युक्त (वेल्डिड) स्टील पाइप एवं टय़ूबें  

जोड़युक्त (वेलडिड) स्टील पाइप और टयूबों के अंतर्गत  विविध  किस्म के  पाइप और टय़ूब  अर्थात् लाइन प्रीसिसेन पाइप, नलिकादार खम्भे(टय़ूबुलर पोल्स), हेम्लिटन पोल्स, एपीआई पाइप, बिजली के खम्भे, स्प्रिंकल्र सिचाई के लिए हल्के भार वाले जस्तीकृत(गेल्वनाइजड) पाइप,  आदि  शामिल हैं। सामान्य श्रेणी के वेल्डिड स्टील पाइपों के लिए  कच्चे माल के रूप में गर्म छड़(होट रॉड) और  ठंडी छड़(कोल्ड रॉड) कॉइलों की जरूरत होती है।

औद्योगिक फास्नर

औद्योगिक फास्नरों के अंतर्गत हाई टेंसिल और माइल्ड स्टील बोल्ट, नट, क्रू, स्ट्ड और पिनें शामिल होती हैं।   हाई टेंसिल और विशेष प्रकार के फास्नरों को छोड़कर अन्य सभी प्रकार के फास्नर लघु उद्योग क्षेत्र के लिए आरक्षित हैं।  इस उद्योग की कुल मांग में सबसे अधिक मांग ऑटोमोबाइल उद्योग की होता है।   

स्टील फोर्जिंग 

स्टील फोर्जिंग आटोमोबाइल, औद्योगिक मशीनों, विद्युत संयंत्रों और रसायन संयंत्रों आदि जैसे महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग अनुप्रयोगों के लिए प्राथमिक मध्यवर्ती होते हैं।

सिलाई मशीनें

देश में सिलाई मशीनों के उत्पादन का प्रमुख स्रोत लघु क्षेत्र हैं, क्योंकि हस्तचालित पारम्परिक सिलाई की मशीनों का उत्पादन इसी क्षेत्र के लिए आरक्षित है।   पारंपरिक घरेलू मशीनों की मांग की पूर्ति पूरी तरह से देशीय उत्पादनों से होती है।

टंकण मशीनें

संगठित क्षेत्र की इकाइयाँ इलैक्टॉनिक टंकण मशीनों सहित सभी प्रकार की टंकण मशीनों का विनिर्माण कर रही हैं। टंकण मशीनों की घरेलू मांगों की पूर्ति पूर्णरूप से देशीय उत्पादन से होती है।

साईकिल उद्योग

साईकिल उद्योग का ध्यान मुख्य रूप से लघु उद्योग क्षेत्र पर ही केद्रित होता है,  क्योंकि फ्री-व्हील और सिंडिगल पीस हब के अलावा अन्य सभी पुर्जे इसी क्षेत्र के लिए आरक्षित हैं। बड़े स्तर की इकाइयों को मात्र उनके अपने उपयोग हेतु साइकिल के ढाँचे, चेन और रिम बनाने की अनुमति दी गई हैं।

इंजीनियरिंग सेवाओं की आउटसोर्सिंग जैसी  उभरती प्रवृत्ति से हाल ही के दिनों में विकास के नए अवसर पैदा हुए हैं।  नए उत्पादों के डिजायन तैयार करने, उत्पादों में सुधार करने, रख-रखाव और डिजायन संबंधी विनिर्माण प्रणालियों जैसी इंजीनियरिंग और डिजायन सेवाएँ काफी हद तक भारत और चीन जैसे देशों को आउटसोर्स की जा रही हैं ।  इसके अलावा, पॉवर, खदान, तेल एवं गैस, तेल शोघन, स्टील, ऑटोमोटिव, ग्राहक टिकाऊ वस्तुओं जैसे क्षेत्रों में  हुई जबरदस्त वृद्धि से भारतीय इंजीनियरिंग उद्योग को बल मिलने की संभावना है।  आगे देखें तो मूलभूत संरचना के विकास पर सरकार के सतत प्रयास भारतीय इंजीनियरिंग उद्योग को आगे ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। विद्युत  क्षेत्र विशेष रूप से ऐसा क्षेत्र है, जो  इंजीनियरिंग क्षेत्र में सबसे अधिक राजस्व अर्जित करता है।  ग्यारहवीं पंच वषीय योजना अवधि के दौरान  भारत सरकार द्वारा भारतीय बिजली क्षेत्र की क्षमता का विस्तार करने के लक्ष्य से भारतीय इंजीनियरिंग क्षेत्र में जबरदस्त वृद्धि होने की संभावना है।  पॉवर क्षेत्र के साथ-साथ  ऑटोमोटिव और उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं जैसे सहयोगी क्षेत्रों के बेहतर निष्पादन और तकनीकी मानव संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता के कारण भारतीय इंजीनियरिंग क्षेत्र आने वाले वर्षों में सशक्त वृद्धि के उच्च स्तर को बनाए रख सकेगा।

Relevant Reports