वस्तु बिक्री अधिनियम, 1930

‘वस्तु बिक्री अधिनयम’ ‘संविदा अधिनयम’ का पूरक है। संविदा अधिनयम के मूल प्रावधान वस्तुओं की बिक्री की संविदा पर भी यथावत् लागू होते हैं। संविदा की मूल अपेक्षाएँ, अर्थात् प्रस्ताव एवं स्वीकृति, कानूनी रूप से प्रवर्तनीय करार, पारस्परिक सहमति, संविदा करने के लिए सक्षम पक्ष, स्वतंत्र सहमति, वैध उद्देश्य, प्रतिफल, आदि वस्तुओं की बिक्री संविदा पर भी यथावत् लागू होते हैं।

बिक्री संविदा - वस्तुओं की बिक्री की संविदा वह संविदा है, जिसके माध्यम से विक्रेता किसी मूल्य के लिए वस्तु रूपी संपत्ति क्रेता को हस्तांतरित करता है, या हस्तांतरित करने की सहमति देता है। एक आंशिक-स्वामी और दूसरे आंशिक-स्वामी के बीच बिक्री की संविदा हो सकती है। कोई बिक्री संविदा पूर्ण या सशर्त हो सकती है। 

वस्तु - “वस्तु” से तात्पर्य है- वाद-योग्य दावों और धन को छोड़कर, हरेक प्रकार की चल संपत्ति, जिसमें स्टाक एवं शेयर, ज़मीन से जुड़ी या उसके हिस्से के रूप में ऐसी वर्द्धमान फसल, शस्य, और चीज़ें, जिन्हें बिक्री से पूर्व काटे जाने की सहमति हुई हो या जो संविदा के अधीन हों।

मूल्य - “मूल्य” से तात्पर्य है- वस्तुओं की बिक्री के प्रति धन का प्रतिलाभ।

बिक्री संविदा कैसे की जाती है कोई बिक्री संविदा किसी मूल्य पर सामान/वस्तु को खरीदने या बेचने का प्रस्ताव कर और ऐसे प्रस्ताव की स्वीकृति के माध्यम से की जाती है। संविदा में वस्तु की तत्काल सुपुर्दगी या मूल्य के तत्काल भुगतान का, या दोनों का, या किस्तों में सुपुर्दगी या भुगतान का, या यह कि सुपुर्दगी या भुगतान, या दोनों, स्थगित किए जाएँगे, ऐसे प्रावधान हो सकते हैं।

बिक्री संविदा लिखित या मौखिक रूप में, या आंशिक रूप से लिखित और आंशिक रूप से मौखिक रूप में या पक्षों के निहितार्थ आचरण के रूप में की जा सकती है।

संविदा दो पक्षों के बीच की जानी होती है – संविदा के लिए दो पक्ष अपेक्षित होते हैं -- “क्रेता” से तात्पर्य है ऐसा कोई व्यक्ति जो वस्तु खरीदता है या खरीदने की सहमति देता है। “विक्रेता” से तात्पर्य है ऐसा कोई व्यक्ति जो वस्तु बेचता है या बेचने की सहमति देता है। एक आंशिक-स्वामी दसरे आंशिक-स्वामी को अपना हिस्सा बेच सकता है।

बिक्री संविदा में बिक्री किए जाने हेतु करार अंतर्निहित होता है – जिन मामलों में किसी बिक्री संविदा के अधीन वस्तु रूपी संपत्ति विक्रेता से क्रेता को हस्तांतरित की जाती है, उनमें संविदा को बिक्री कहा जाता है, किंतु जिन मामलों में वस्तु रूपी संपत्ति का हस्तांतरण किसी भावी समय पर होना है, या उसके बाद कुछ शर्तों को पूरा किए जाने पर किया जाना होता है, उनमें संविदा को ‘बिक्री किए जाने हेतु करार’ कहा जाता है। नियत समय बीत जाने पर, या उन शर्तों को पूरा किए जाने पर, जिनके अधीन वस्तु रूपी संपत्ति का हस्तांतरण किया जाना है, बिक्री किए जाने हेतु करार स्वत: ‘बिक्री’ बन जाता है।  

संपत्ति का हस्तांतरण - “संपत्ति” से तात्पर्य है वस्तु रूपी सामान्य संपत्ति अर्थात् ‘पूर्ण स्वामित्व’। अत:, ‘सामान्य संपत्ति’ के हस्तांतरण के लिए बिक्री होना अपेक्षित है। कब्ज़े का हस्तांतरण संपत्ति का हस्तांतरण नहीं माना जाता है। तथापि, यदि बिक्री का संव्यवहार पूरा होने के बाद वस्तु विक्रेता के कब्ज़े में बनी रहती है, तो उस संपत्ति का ‘कब्ज़ा’ विक्रेता के पास होगा, किंतु ‘संपत्ति’ क्रेता की होगी। .

सामान्य नियम के रूप में, जब तक संविदा में अलग से विशिष्ट प्रावधान न हो, तब तक भुगतान का समय संविदा का मूल-तत्त्व /मर्म नहीं है। दूसरे शब्दों में, भुगतान का निर्दिष्ट समय एक प्रकार की ‘वारंटी’ है। यदि भुगतान समय पर नहीं किया जाता है, तो विक्रेता क्षतिपूर्ति /हर्जाने का दावा कर सकता है, किंतु संविदा को नकार नहीं सकता है।  

वस्तु का मूल्य अदा न करने के विरुद्ध विक्रेता के अधिकार / संविदा भंग करने की स्थिति में क्रेता के अधिकार वस्तु के बेचे जाने और क्रेता को हस्तांतरित किए जाने के बाद, यदि क्रेता मूल्य अदा नहीं करता है, तो विक्रेता के पास न्यायालय की शरण में जाने के अलावा अन्य कोई उपाय नहीं होता है। क्रेता को वस्तु रूपी संपत्ति का हस्तांतरण हो जाने पर, विक्रेता के पास क्रेता से वस्तु का बलपूर्वक कब्ज़ा लेने का अधिकार नहीं होता है।

संविदा भंग की स्थिति में, क्रेता अपने अधिकारों का प्रवर्तन कर सकता है। क्षतिपूर्ति एवं हर्ज़ाने की मात्रा/राशि संविदा अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार होगी।